सोमवार, 31 दिसंबर 2012

क्षितिज़ का समुद्र



कुछ अधूरी बातें हैं,
कुछ अधूरे ख्वाब,
कुछ अनछुए सपने हैं,
कुछ छिपे हुए संताप,
कुछ लालसाएं हैं,
खोयी सी,
कुछ अनसुलझे सवाल,

कुछ धागे हैं,
रेशम के,
करघो पर लिपटे हुए,
कर रहे इंतज़ार,

कोई कील है,
दीवाल से सर निकाल कर,
झांकती हुई,
क्षितिज के उस पार,

अनमनी पसरी हुई परछाईं है,
लम्बवत गिरती हुई धुरी पर,
खोज रही है,
लंब की परिधि,
अपरिमित, विशाल,

कुछ ऊष्मा में संचार अभी भी है,
कुछ सपने अभी भी अटके हैं,
कुछ लालसाएं अभी भी निहार रही है,
लार टपकाते हुए,
छिपे हुए सवालों के मध्य,
गुथ्थमगुथ्था सर और पैर एक दुसरे में फंसाए हुए,
कि अभी हालात इतने नहीं बिगड़े,
घुटने टेक ही देंगी एक दिन,
और टूट कर गिर जायेंगे,
कुछ तारे,
ऊष्मा, सपनों, लालसाओं और सवालों,
का जवाब बन कर,
एक आग की चमकविहीन पूँछ बनकर,
क्षितिज़ के समुद्र में।

-नीरज

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