गूगल से साभार
वह हमारे घर के पास ही रहती थी,
शायद बगल में फैली हुई झोपड़पट्टियों में कहीं,
जब तब बच्चों के साथ आकर खेल जाती थी,
और साथ में अपना छोटा सा बचपन छोड़,
जाती थी उनके पास,
घुटनों के ऊपर तक की फ्रॉक,
वो भी मैली कुचैली और फटी हुई,
शायद किसी की दी हुई ही थी,
नहाती भी थी या नहीं,
लेकिन बच्चे उसे दीदी दीदी कहकर पकड़ लेते,
काश हम भी बच्चों की ही तरह होते,
अबोध!
बड़ी हो रही थी, पता नहीं उसे इसका पता भी था या नहीं,
लेकिन उसके फटे हुए फ्रॉक से झांकता उसका यौवन छुपा नहीं था,
और गाहे बगाहे लोग अपनी आँखें सेंक ही लेते थे,
नज़रों को बचाकर टोह लेते थे उसकी देह को,
दिवाली के दिन की बात है,
पटाखों के कनफोड़ के बीच उसकी आवाज़ कहीं खो गयी,
जब कुछ नंगी निगाहों ने उसे दबोच लिया,
तड़पकर रह गयी होगी उसकी मासूमियत,
फिर नोच नोच कर गिध्धों ने उका स्वाद चखा,
और दूसरे दिन सुबह बिखरी हुई पाई गयी,
बगल के कूड़ेदान पर,
अब वह नहीं आएगी अपना बचपन बाँटने,
न ही बच्चे फिर खेल पाएंगे अपनी दीदी से,
और न ही वह दीवार पकड़ के खड़ी मिलेगी झांकती हुई,
अपनी मासूमियत लिए,
लेकिन नंगी नज़रों को फिर तलाश है,
गन्दी, मैली कुचैली फ्रॉक से झांकते यौवन की,
क्या पता अब कौन चिड़िया बिखरेगी,
और ऐसी कितनी चिड़ियाएं बिखरती रहेंगी,
बड़ी बड़ी बिल्डिंगों से लगी झोपड़पट्टियों में।
-नीरज

0 टिप्पणी:
एक टिप्पणी भेजें