सोमवार, 10 मार्च 2014

प्रेम


तुम्हे जाना था, चली गयी,
मुझे अभी रुकना है प्रिय,
मुझे झेलने हैं अभी बहुत कुछ,
तुम्हारी आँखों से ढुलका वह आंसूं सब कुछ राख कर चूका है,
तुम्हे निहारती आँखों ने अपने आगोश में ले लिया है,
तुम्हे शायद कोई कन्धा मिल जाये प्रिय,
जिसपे तुम अपने सिर को रख कर रो सको,
मुझे अभी खेलना है इस राख से,
इसकी भभूती मुझे जीवित रखेगी,
युग युगांतर तक,
दुखों के अनेको युग देखने के लिए,
मुझे ढूंढनी है अभी वह गुफा,
जहाँ जाकर मैं अपने प्रेम की तिलांजलि दे सकूँ,
जहाँ मुझे अपना प्रेम सुरक्षित दिखाई दे,
घायल और लथपथ ही सही,
लेकिन ह्रदय की धमनियां उसे इतना रक्त दे सकें,
कि वह देख सके मेरे साथ, दुखों के अनेकों युग,
प्रेम को सिसकते हुए, मरते हुए, आहें भरते हुए,
वह देख सके मेरे साथ,
मेरी आँखों में बहता तेज़ाब.

तुम अब दुखी मत होना प्रिय,
ना ही जगाना अपनी रातों को,
मत करना मुझे याद, जब बत्तियां बुझ जायें,
ना ही डूबते हुए सूरज को देखकर,
क्षितिज में अपनी आहें डालना,
क्या पता तुम्हे मैं इसीलिए मिले था कि,
तुम जान सको की मुझसे बेहतर भी कोई है इस संसार में,
मुझे कोई राग या द्वेष नहीं है प्रिय,
क्यूंकि तुमसे बेहतर मेरे लिए कोई नहीं है,
फिर भी मैं प्रेम की धुनी रमाऊंगा,
तुम ना सही, तुम्हारे यादों की चिलम जलाऊंगा,
और उसधुएं से वही संसार बनाऊंगा, जो तुम्हे प्रिय था,
अंधेरों और ओट का प्यार, बनावटी दुनिया से छिपा हुआ इकरार,
बेमतलब की सामाजिकता का प्यार,
सिसकती टूटती रश्मों रिवाजों वाला प्यार प्रिय,
मैं फिर से पाषाण बनने को तैयार हूँ,
बस तुम खुश रहना,
तुम्हारे आंसुओं को मैंने रख लिए हैं, जब समंदर का खारापन कम हो जायेगा,
तब डाल दूंगा उसे समंदर में, मुझे ना सही,
कईयों को जीवनदान मिल जायेगा प्रिय.

क्षितिज सिमटने लगा है,
मैं देख रहा हूँ तुम्हे, मेरी आँखें मुदने लगी हैं,
डूबते हुए सूर्य की लालिमा में मैं देख सकता हूँ, तुम्हारा हाथ मेरे हाथों में,
मेरा हाथ तुम्हारे हाथों में, हम दोनों को एक साथ,
सूर्य रुक जाओ जरा, अपने अश्वों को रोक लो,
रुक जाओ समय, कि शायद प्रेम अभी बाकी है.

- नीरज


चित्र साभार: के डी सिंह चौहान

1 टिप्पणी:

Rajendra kumar ने कहा…

बहुत ही भावपूर्ण बेहतरीन प्रस्तुती,आभार।

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