समुद्र देखे बहुत दिन गुजर गए हैं,
और गुजर गए हैं कई मंजर,
कुछ ऐसे जैसे लहरें बहा ले गयीं वक़्त के कुछ टुकड़े।
दूर कहीं किसी वीरान से टापू पर उगा होगा एक पौधा,
अंकुरित होने के पहले उसने वक़्त से चुरा लिए होंगे कुछ पल,
झाड़ियों के नीचे छिपा,
छांव की सीलन में उसने धीरे से निकाला होगा अपना सिर,
जब धूप ने धप्प से मारा होगा धप्पा,
और अपनी आँखों को मलते हुए,
जैसे ही खोली होगी उसने आँखें,
समुद्र से होकर आता हुआ हवा का झोंका उससे लिपट गया होगा,
और टांक गया होगा लहरों से उड़ाकर लाये वक़्त के उस टुकड़े को।
हाँ वक़्त के उसी टुकड़े में,
जमी होंगी कुछ यादें,
मेरी - तुम्हारी,
दूर क्षितिज में डूबा सूर्य भी,
जो लहरों में डूबते हुए लाल कर गया था समुद्र को,
और तुमने अपनी छोटी छोटी आँखें मीचे हुए,
जोर से मेरा हाथ पकड़ कर चिल्ला कर कहा था,
"वो देखो सूरज कितना प्यार लग रहा है."
मैंने देखा था क्षितिज को,
औए उसके आईने में सब कुछ दहक़ कर लाल हो गया था,
और कई पक्षी उड़ चले थे एक साथ लाल होते क्षितिज की ओर।
हाँ उसी वक़्त के टुकड़े में कैद हैं,
तुम्हारा सफ़ेद पड़ गया चेहरा,
जो कैमेरे की फोटुओं के डिलीट होने पर रुआंसा होकर चुप हो गया था,
इस उम्मीद पे कि डूबता सूरज और उड़ते पक्षियों के साथ,
हमारी कुछ फोटुएं अभी भी बच गयी हैं,
जो दूसरे कैमेरे से ली गयी थीं,
और आंसू का एक मोती चाहकर भी नहीं गिर पाया था,
और कैद होकर रह गया था तुम्हारी आँखों में,
तुम्हारा सिर मेरे कंधे पर आ गया था,
और हथेलियाँ मेरी हथेलियों में,
और मिल गयी थी,
मेरी तुम्हारी कई रेखाएं एक साथ,
और पसीने की एक छोटी सी नदी ने,
उनमे चिपक के दम तोड़ दिया था।
उस दिन समुद्र ने बड़ी ऊँची ऊँची लहरें ली थीं,
कि कितनी तेजी से बहा के ले जाए वक़्त के उन टुकड़ों को,
जो तुम्हारे और मेरे बीच अभी भी सांसें ले रहा था,
लेकिन हवा के उस झोंके ने उसे झट से छीन लिया था,
और लिपट गया था झाड़ियों की ओट से निकल आये उस पौधे से,
अब उसके पत्तों का रंग लाल है,
और निकलती फुंगियां एक बारगी ही जल उठती हैं,
और उनसे निकल आते हैं एक साथ यादों के कई फव्वारे,
जो पत्तों में बदल कर उसकी टहनियों से चिपक जाते हैं।
यादों के उन टुकड़ों की सांस अब भी लेता है वह पौधा,
और तुम्हारी आँखों में धीरे से उतर आती है वह शाम,
और पौधा शरमा कर छुप जाता है, झाड़ियों की सीलन में,
साँसों की धौकनी के बीच एक लम्बी सांस चुराते हुए।
- नीरज
और गुजर गए हैं कई मंजर,
कुछ ऐसे जैसे लहरें बहा ले गयीं वक़्त के कुछ टुकड़े।
दूर कहीं किसी वीरान से टापू पर उगा होगा एक पौधा,
अंकुरित होने के पहले उसने वक़्त से चुरा लिए होंगे कुछ पल,
झाड़ियों के नीचे छिपा,
छांव की सीलन में उसने धीरे से निकाला होगा अपना सिर,
जब धूप ने धप्प से मारा होगा धप्पा,
और अपनी आँखों को मलते हुए,
जैसे ही खोली होगी उसने आँखें,
समुद्र से होकर आता हुआ हवा का झोंका उससे लिपट गया होगा,
और टांक गया होगा लहरों से उड़ाकर लाये वक़्त के उस टुकड़े को।
हाँ वक़्त के उसी टुकड़े में,
जमी होंगी कुछ यादें,
मेरी - तुम्हारी,
दूर क्षितिज में डूबा सूर्य भी,
जो लहरों में डूबते हुए लाल कर गया था समुद्र को,
और तुमने अपनी छोटी छोटी आँखें मीचे हुए,
जोर से मेरा हाथ पकड़ कर चिल्ला कर कहा था,
"वो देखो सूरज कितना प्यार लग रहा है."
मैंने देखा था क्षितिज को,
औए उसके आईने में सब कुछ दहक़ कर लाल हो गया था,
और कई पक्षी उड़ चले थे एक साथ लाल होते क्षितिज की ओर।
हाँ उसी वक़्त के टुकड़े में कैद हैं,
तुम्हारा सफ़ेद पड़ गया चेहरा,
जो कैमेरे की फोटुओं के डिलीट होने पर रुआंसा होकर चुप हो गया था,
इस उम्मीद पे कि डूबता सूरज और उड़ते पक्षियों के साथ,
हमारी कुछ फोटुएं अभी भी बच गयी हैं,
जो दूसरे कैमेरे से ली गयी थीं,
और आंसू का एक मोती चाहकर भी नहीं गिर पाया था,
और कैद होकर रह गया था तुम्हारी आँखों में,
तुम्हारा सिर मेरे कंधे पर आ गया था,
और हथेलियाँ मेरी हथेलियों में,
और मिल गयी थी,
मेरी तुम्हारी कई रेखाएं एक साथ,
और पसीने की एक छोटी सी नदी ने,
उनमे चिपक के दम तोड़ दिया था।
उस दिन समुद्र ने बड़ी ऊँची ऊँची लहरें ली थीं,
कि कितनी तेजी से बहा के ले जाए वक़्त के उन टुकड़ों को,
जो तुम्हारे और मेरे बीच अभी भी सांसें ले रहा था,
लेकिन हवा के उस झोंके ने उसे झट से छीन लिया था,
और लिपट गया था झाड़ियों की ओट से निकल आये उस पौधे से,
अब उसके पत्तों का रंग लाल है,
और निकलती फुंगियां एक बारगी ही जल उठती हैं,
और उनसे निकल आते हैं एक साथ यादों के कई फव्वारे,
जो पत्तों में बदल कर उसकी टहनियों से चिपक जाते हैं।
यादों के उन टुकड़ों की सांस अब भी लेता है वह पौधा,
और तुम्हारी आँखों में धीरे से उतर आती है वह शाम,
और पौधा शरमा कर छुप जाता है, झाड़ियों की सीलन में,
साँसों की धौकनी के बीच एक लम्बी सांस चुराते हुए।
- नीरज
2 टिप्पणी:
सुन्दर चित्रण
सुन्दर रचना
हार्दिक आभार महेश।
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