शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

ठंढ की एक रात

एक बंद कमरा,
कोने का टेबल लैंप,
बाहर कडकडाती ठंढ,
और घुप्प अँधेरा,
रात जो हो चुकी है,
कम्बल में दुबका जाड़ा,
और जागता हुआ मैं।
(मैं कभी सो नहीं सकता)
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दो दिन हो गए कहीं नहीं निकला,
धूप कैसी होती है?
परसों देखा था,
पीली पसरी हुई थी सड़कों पर,
कुचली हुई,बदहवास।
(धूप,औरत और कमज़ोर हमेशा कुचले ही जाते हैं!)
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दूध उबल रहा है,
कमरे में सीलन टपकने लगा है,
चाय की पत्ती कड़ी पीनी है,
टीवी लगातार चल रहा है,
और मैं छांट रहा हूँ अपने विचार,
बंद कमरे की चारदीवारी में,
विचारों पर ताला लग सकता है क्या?
(कितना भी बंद रहूँ कमरे में लेकिन लिख तो सारा जहाँ सकता हूँ।)
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किसी ने टिपण्णी दे दी है,
आँखें लाइक्स और कमेन्ट पर टिकी हैं,
पब्लिशर ने फोन किया था,
परसों मिलना है,
कम्बल कुछ गर्म होने लगा है,
रात उबलने लगी है,
और चाँद के पतीले से,
चाय छानकर पी रहा हूँ,
परसों पब्लिशर से मिलना है।
(चलो शायद कुछ पैसे मिल जायें/कुछ और रातें गुजर जाएँगी।)
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ठंढ़ का जायका कड़वा होता है, पसीना मीठा लगता है ठंढ में,
और चाय बरसात सी बरसती हुई ठंढ के पसीने को पी जाती है।
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बंद कमरा बंद ही रहता है,
सीखचों से रौशनी का अँधेरा अक्सर झांक लगा जाता है,
यह देखने के लिए,
कि मैं जिन्दा तो हूँ न,
विचारों के दायरे में मैं मर गया था क्या?
या फिर झांक रहा था,
उन विचारों को,
जो मर चुके हैं,
या फिर मरने वाले हैं।


-नीरज

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