बुधवार, 19 दिसंबर 2012

"मुझे दिल्ली जाना है"

आज मैं खुश नहीं हूँ,
मेरी हंसी को खुशी मत समझ लेना,
मैं रो रहा हूँ खून के आंसूं,
इस हंसी की बनावटी परतों के पीछे।

आज नज़रें नहीं मिला पा रहा मैं तुमसे,
और डर के मारे काठ मार गया है मुझे,
आज कोस रहा हूँ कहीं उस दिन को,
जब तुम आई थी,
सबसे ज्यादा खुश मैं ही तो था,
लेकिन आज उतना ही दुखी हूँ,
आज भी खुश होता हूँ,
जब तुम अपने पंख फ़ैला कर उडती हो,
फुदकती हो और खुश होती हो,
लेकिन आज डर लग रहा है,
कि कहीं तुम्हारी ख़ुशी को किसी की गन्दी नज़र न लग जाये!

पर कहीं इस दिल में चैन है,
कि तुम उस शहर में नहीं हो,
जहाँ इंसानियत अब भागम भाग में,
क़त्ल कर दी गयी है,
और लोगों ने बंद कर लिए हैं,
अपने दरवाज़े,
संवेदनाओं और भावनाओं के लिए,
दिलों में बंद कर के,
डर की खामोश आवाज़,
मैं खुश हूँ,
कि तुम यहाँ नहीं हो,
लेकिन मैं उतनी ही बार मरता हूँ,
जब जब तुम कहती हो,
कि
"मुझे दिल्ली जाना है"
हाँ बेटी मैं हर बार मरता हूँ,
जब तुम यह पूछती हो।

-नीरज

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