गूगल से साभार
तुम्हारी हर एक मुस्कान पर हंसा मैं,
ना चाहते
हुए भी,
हर दर्द को
चाहा बाँटना,
तुम्हारे सर
को रखा हमेशा अपने कंधे पर,
या सच कहो
तो तुम्हे एक घुट्टी बना के पी गया मैं,
जहाँ
तुम्हारा उसरपन मुझे भी बंजर करता था,
तुम्हारे
गालों पे ढुलका आँसूं का कतरा,
मेरे भी
गालों को तर कर जाता था,
क्यूंकि
मैंने कभी तुम्हे तुम नहीं,
मैं समझा,
लेकिन इस
तुम और मैं के हाशिये पर,
हम कभी
"हम" नहीं बन पाए,
तुम मुझे
उखाड़ती रही,
और मैं
तुम्हे फेंकता रहा,
और बीच में
पसरा प्रेम,
बंजर होकर
लूह में झुलसता ही रहा,
चलो देर
आयद, दुरुस्त आयद,
फिर से
संवारते हैं प्रेम को,
तुम और मैं
से निकलकर,
हम होकर,
प्रेम की
उर्वरक जमीन तैयार करते हैं,
तुम हो न
साथ मेरे,
मेरे-तुम्हारे/हमारे,
प्रेम के।
-नीरज

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