रविवार, 24 नवंबर 2013

एक याद जो अब कहीं भीगते हुए याद करती है मुझे...........


एक याद जो अब कहीं भीगते हुए याद करती है मुझे........... 
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तुम यूँ ही बरसते रहो,
मैं पानी को छूते ही 
तुम्हारे स्पर्श को सहेज लूंगी,
कुछ अब भी सीलता है जब,
तो तुम्हारी पनियाली निगाहें,
चश्मे के पार बहने लगती हैं,
और मैं खो जाती हूँ,
कि क्या अब भी कहीं कुछ भीगा है,
कभी कभी भीगता मन,
सूखेपन से ज्यादा सुकून देता है।

- नीरज

8 टिप्पणी:

Niraj Pal ने कहा…

हार्दिक आभार राजीव जी।

Rajeev Kumar Jha ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (30-11-2013) "सहमा-सहमा हर इक चेहरा" “चर्चामंच : चर्चा अंक - 1447” पर होगी.
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
सादर...!

आशीष अवस्थी ने कहा…

बहुत बढ़िया व सुंदर कृति , नीरज भाई
नया प्रकाशन --: अपने ब्लॉग या वेबसाइट की कीमत जाने व खरीदें बेचें !

Kailash Sharma ने कहा…

अंतस को छूते बहुत कोमल अहसास...बहुत सुन्दर

Niraj Pal ने कहा…

आप सभी का हार्दिक आभार, इधर कुछ दिनों से कार्यालय की व्यस्तता के चलते ब्लॉग्स पर आ नहीं पा रहा हूँ, बहुत जल्द फिर से शुरू करूँगा और कोशिश यही होगी कि अधिक से अधिक ब्लॉग पर पहुँच सकूँ और अपने टिप्पणियों को भी प्रेषित कर सकूँ।

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत सुन्दर

Shekhar Suman ने कहा…

बहुत खूब...

पंख ने कहा…

really touching :)

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