एक याद जो अब कहीं भीगते हुए याद करती है मुझे...........
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तुम यूँ ही बरसते रहो,
मैं पानी को छूते ही
तुम्हारे स्पर्श को सहेज लूंगी,
कुछ अब भी सीलता है जब,
तो तुम्हारी पनियाली निगाहें,
चश्मे के पार बहने लगती हैं,
और मैं खो जाती हूँ,
कि क्या अब भी कहीं कुछ भीगा है,
कभी कभी भीगता मन,
सूखेपन से ज्यादा सुकून देता है।
- नीरज

8 टिप्पणी:
हार्दिक आभार राजीव जी।
बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (30-11-2013) "सहमा-सहमा हर इक चेहरा" “चर्चामंच : चर्चा अंक - 1447” पर होगी.
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
सादर...!
बहुत बढ़िया व सुंदर कृति , नीरज भाई
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अंतस को छूते बहुत कोमल अहसास...बहुत सुन्दर
आप सभी का हार्दिक आभार, इधर कुछ दिनों से कार्यालय की व्यस्तता के चलते ब्लॉग्स पर आ नहीं पा रहा हूँ, बहुत जल्द फिर से शुरू करूँगा और कोशिश यही होगी कि अधिक से अधिक ब्लॉग पर पहुँच सकूँ और अपने टिप्पणियों को भी प्रेषित कर सकूँ।
बहुत सुन्दर
बहुत खूब...
really touching :)
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