सोमवार, 26 दिसंबर 2011

लेकिन तुम तुम क्यूँ हो...????


ठंढ की यह रात और तुम....
मानो या न मानो पर मेरे जीवन में सब कुछ यूँ ही नहीं घटित होता...
सबका एक कारण है.... और हर कारण में एक अपवाद....
और विचित्रता की पराकाष्ठा यह की हर अपवाद में...
दिखता है मुझे तुम्हारा अख्श...
जैसे कहीं अन्दर तक झांक कर आती हो तुम मुझे...
कभी कभी तो आँखें भीच कर बंद कर लेता हूँ...
(यह डर है या सत्य से भागने की असफल कोशिश)...
कि तुम न दिखो.... कुछ घटित होने जैसी आशंका का शायद कहीं मैं गला घोंट सकूँ ...
सुखी हुई पत्तियों में से घीशु की तरह पीली आग पैदा कर सकूँ...
चरमराती टूटी हुई चारपाई से तुम्हारे एहसास को मिटा सकूँ...
पर हर बार मैं हार जाता हूँ तुमसे...
ठंढ की इस काली स्याह रात कि तरह!!!!!!!!!
न चाहते हुए भी क्यूँ तुम शामिल ही जाती हो मेरे अंतर्मन में..
हर बार आकर(जब मैं तुम्हे भूल चूका होता हूँ या ऐसा प्रतीत होता है) खटखटा जाती हो मन के जीर्ण द्वार...
और मैं ठगा सा तुम्हे देखता रह जाता हूँ...
अपलक....उस यात्री की तरह जो चला जा रहा है अनमना सा इस आस के साथ की कहीं तो मंजिल होगी...
कहीं तो लगेगा इस रस्ते को विराम!!!!
पर रास्ते तो रास्ते होते हैं...टेढ़े मेढ़े..ऊँचे नीचे...पथरीले भी और कंकरीले भी...
सांप की तरह सर्पाकार तो सरल रेखा की तरह बिलकुल सीधे...
कभी खतम हुए हैं कहीं...गंगा की तरह अपनी शाखाएं हर बार बना ही लेते हैं...
मैं सोचता हूँ....कि तुम्हे पकड़ कर बंद कर लूँ...
अपनी इस मुठ्ठी में...और तुम खो जाओ मेरी हस्त रेखाओं में ....
लेकिन तुम वहां भी रास्ता बना ही लेती हो...
पानी की तरह मेरे हांथों को गीला करके झरकर फिर से खड़ी हो जाती हो...
मेरे सम्मुख....और मैं विवश हो जाता हूँ....थक कर बैठ जाता हूँ...यह सोचते हुए कि...
मेरे जीवन में सब कुछ यूँ ही नहीं घटित होता...
हर बार इरादा बनाता हूँ...कि बस अब बहुत हुआ...अब और नहीं...
लेकिन तुम मेरे हर बज्र इरादे में सेंध लगा ही लेती हो...
अपने आलिंगन का वास्ता भी देती हो...मैं भागता हूँ....
तुम्हारी गर्म होती हुई सांसों से कि कहीं मैं खो न जाऊं..
तुम्हारे इस भ्रम जाल में....जो मुझे लगती तो यूँ मिथ्या है...
पर सत्य से भी कर्कश और बज्र से भी कठोर है...
भला ऐसे थोड़े ही तुम हर बार...मेरे सारे मिथकों को धत्ता बताते हुए कैसे खड़ी हो जाती हो...
मेरे सम्मुख अपने होठों पर मोनालिसा कि रहस्यमय मुस्कान लिए हुए...
और मैं न चाहते हुए भी विवश हो जाता हूँ....तुम्हारी मौन आँखों में झाँकने के लिए...
जहाँ मुझे सब कुछ दिखता है....जो मुझे अपने भीतर झाँकने का अवसर ही नहीं प्रदान करता...
क्या हो तुम...कि इस तरह से मेरे हर आवरण में लिपटी हुई हो...
कि चाहकर भी अलग नहीं कर पाता अपनी शख्शियत तुमसे...
कभी कभी तो तेज रौशनी में भी कांप जाता हूँ....
जब अपने ही प्रतिविम्ब को दूर तक रबड़ कि तरह फैले हुए देखता हूँ...
कि कहीं इसमें भी तो जगह नहीं बना ली है तुमने..
जो ये यूँ खींचकर लम्बा हो गया है...
भय का आलम यह है कि सूर्य को उगते हुए देखता हूँ...
तो छा जाती हो मन मस्तिष्क में दूर तक...अपनी आभा बिखेरते हुए...
क्षितिज कि तरह लाल होकर जलने लग जाता हूँ...
तब भी तुम मुझे नहीं छोडती...
झरने कि तरह बहता हूँ तो सूखे पत्ते कि तरह सवार हो जाती हो मुझ पर..
और बहने लगती हो मेरी ही मानिंद...झरझर कलकल...
और तय कर लेती हो मेरे ही साथ मेरे सारे आयाम...
लेकिन एक बार तो बता दो क्यूँ करती हो तुम ऐसा...
क्या रिश्ता है भला मेरा तुम्हारा...
जो मुझे बादल बनाकर बरस जाती हो मेरे मन मानस पर जब तब...
और मैं झन्ना कर जब बजने लगता हूँ...तो तुम वीणा की तरह...
मधुर होकर एक नया ही तान छेड़ देती हो...जैसे ही मैं डूबने को होता हूँ तुममे...
सहसा झकझोर देती हो तुम मेरे सारे वाद्य और सरगम बनकर मैं तुममे और तुम मुझमे विलीन हो जाती हो...
ठीक वैसे ही...जैसे सागर में जाकर नदी अपना नया वजूद बना लेती है...
लेकिन क्यूँ हो तुम उपस्थित मेरे सारे आयामों में...मुझमे...मेरे हर पल में...क्षण में...
वक़्त कि तरह मेरे साथ हर पल बहने को क्यूँ रहती हो यूँ आकुल...
कभी कभी तो हद ही कर देती हो...जब यूँ ही बिना किसी कारण के...
हंसने लग जाती हो और हंसती ही रहती हो....
मैं देखता रह जाता हूँ तुम्हारा यह भी रूप...कि भला ऐसा भी हो सकता है....
मेरे सारे दुखों, दुस्वप्नों को जब तुम एक प्याले में डालकर पी जाती हो...
सोचता रह जाता हूँ कि जीवन के हर प्रहर में भला क्यूँ होना होता है तुम्हे मेरे साथ...
या फिर यही विधान है...सत्य है...और हर सत्य से परे का भी अपवाद हो तुम...
पर जैसी भी हो....स्वप्न सही दुस्वप्न सही....हर आयामों में बनाती नया सोपान हो तुम...
मैं हारा ही सही....चाहे ठंढ कि यह स्याह रात हो...या फिर शिमला की बर्फ से ढंके देवदार और चिनार के पेंड़..
निर्जन ही सही मैं....इस निर्जनता की पहचान हो तुम...
हाँ तुम....लेकिन तुम तुम क्यूँ हो...????

-नीरज

3 टिप्पणी:

Rajeev Kumar Jha ने कहा…

बहुत सुंदर कविता.

Niraj Pal ने कहा…

हार्दिक आभार राजीव जी।

Niraj Pal ने कहा…

हार्दिक आभार जोशी जी।

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