गूगल से साभार
1)
बीत गया इतवार,
और शुरू हो गयी कच मच पहले जैसे ही,
न तुम्हारे पास समय है,
और न ही मेरे पास तुम्हे देने को,
ऑफिस में पहुँचकर तुमने एक फोन कर दिया था,
वह दिलासा थी शायद,
तुम्हारे होने की और लाखों पदचापों के शोर के मध्य,
तुम्हारा और मेरा वजूद,
वैसे ही दिखते हैं अब,
जैसे लखनऊ में घर के कैलेंडर में,
लटकता हुआ कुतुबमीनार,
और नीचे गोलों में बंद अगले पाँच दिन।
2)
सुबह छः बजते ही दौड़ने लगा मैं,
मशीनों की तरह,
यंत्रवत से सारे कार्य, नित्यकर्म भी,
चाय की घूंट भी न पी पाया था,
जब ड्राईवर ने मोबाइल को घनघना दिया था,
कुर्सी पर बैठ कर तुम्हे ही देख रहा था,
सोते हुए कितनी सुन्दर लगती हो,
लेकिन अभी कुछ देर में ही एक यन्त्र तुममे भी,
चस्पा हो जायेगा,
और हर शाम तुम्हारे आने से पहले मैं सो जाऊंगा,
फिर मुझे तुम देखना सोते हुए,
बिना बात किये ये मूकवार्ता भी कितना,
सुकून देती है कभी कभी .........है न?
3)
एस एम् एस किया था ना तुम्हे,
नहीं पढ़ा तुमने फिर से?
ट्रैफिक बहुत ज्यादा थी, किसी की शादी थी,
पूरी सड़क पर ही फ़ैले हुए थे बाराती,
जैसे सड़क उनकी बपौती हो?
तुम कहते हुए अन्दर घुसी,
और मैं चला गया आज से कुछ साल पहले,
हमारी शादी के वक़्त भी तो कुछ ऐसा ही हुआ था,
लेकिन क्या तुमने या फिर मैंने ही,
सोचा था कभी ये सब?
लेकिन अब सोचो तो कितना अजीब सा लगता है,है ना?
शायद समय की झुर्रियां बिना बताये यूँ ही आ जाती हैं।
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-नीरज

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