मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

बारिश और छतरी

बीत गया वह वक़्त भी,
जब रात बीत जाती थी,
आँखों में,
और हाथों की सिगरेट,
जलती रह जाती थी,
खिड़की के पास बैठ कर,
बरसती हुई बारिश में तुम्हारा चेहरा देखने की कोशिश में।
बूंदों से बनते हुए बुलबुले,
तुम्हारे पैरों के पास पैदा होते ही,
मचलकर मिट जाते थे,
और मैं व्यथित हो उठता था,
जैसे ही दिखने को होता था तुम्हारा चेहरा,
हमेशा तुम्हारी छतरी बीच में आ जाती थी,
और बस तुम्हारे बालों की लटों में,
उलझकर बीत जाता था दिन,
बारिश के दूसरे दिन के इंतज़ार में।
फिर बारिश भी चली गयी,
चुपचाप,
जैसे शोर मचाते हुए आई थी,
और तुम हजारों में खो गयी,
क्यूंकि मैं तो तुम्हारी छतरी ही पहचानता था,
तुम्हे तो कभी देख ही न पाया,
आज भी मचलता हूँ,
किसी छतरी में जब जाते हुए देखता हूँ तुम्हे,
सोचता हूँ जाके रोक लूँ तुम्हारा रास्ता,
और छतरी को फेंक दूँ मेरे और तुम्हारे बीच से,
लेकिन हाथों में थमी सिगरेट अब बुझ चुकी है,
और रात अब आँखों में नहीं कटती,
क्या पता छतरी के उस पार,
तुम भी अब वो न हो,
बीते हुए वक़्त की तरह।

-नीरज

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