चित्रकृति: गूगल से साभार
1)
माँ चुप हो गयी थी,
माँ चुप हो गयी थी,
यह कहने के बाद,
शायद मैं ही न समझा होऊं उसकी चुप्पी,
बचपने में भला किसको समझ होती है,
इन दुनियावी बातों की।
------------------------------ ------------------------------ -
पर यह भी एक सच है,
माँ ने इश्वर से हमेशा बेटी ही माँगा था अपने लिए,
जब छोटा पैदा हुआ था,
तो मेरी कामवाली माई( हम माई ही बुलाते थे उसे) बहुत रोई थी,
कि बेटी फिर नहीं आई,
और माँ की आँखों में बंद आंसू,
दादी को देखते ही कहीं गुम हो गए थे,
और रेंग गयी थी,
एक फीकी सी कृत्रिम मुस्कान उसके होठों पर,
शायद एक बेटी की माँ होना उसके भाग्य में लिखा ही नहीं था,
और मेरी कलाई सूनी ही रह जाती थी,
हर राखी पर।
------------------------------ --------------------------
2)
हर बाप चाहता है कि उसकी बेटी,
हर बाप चाहता है कि उसकी बेटी,
उससे बड़े घर व्याही जाये,
दादाजी ने भी कुछ ऐसा ही किया,
फुआ की शादी हमसे बहुत बड़े घर में हुई,
फुआ गहनों से लदी हुई आती थी हमेशा,
जब भी आती थी,
पर फुआ के होंठ कुछ कम बोलते थे,
कभी भी नहीं जान पाया क्यूँ?
एक बार मुझे भी मौका मिला उस बड़े घर जाने को,
बहुत बड़ा घर था,
और आँगन के रोशनदान की सीमेंट वाली प्लेट पे गुदा हुआ था,
"ढोल गवांर शूद्र पशु नारी,
यह सब तारन के अधिकारी।"
मैंने फुआ की तरफ देखा था, और पूछा था,
क्या सच?
फुआ ने कुछ बोला नहीं,
चुपचाप अपने कमरे में चली गयीं।
------------------------------ ------------------------------ --------------बचपन/2
-नीरज

0 टिप्पणी:
एक टिप्पणी भेजें