मैं खोज हा हूँ,
किसे?
तुम्हे पता नहीं?
लेकिन अब पता होने से भी क्या होता है?
प्रश्नों में भावनाओं को खोकर पाना आसान नहीं होता,
मैं खोज रहा हूँ प्रेम को,
उस मूक अभिव्यक्ति को,
जो तुम्हारे और मेरे बीच अभी भी कहीं रह गयी है,
बीज की तरह,
खोज रहा हूँ एक उर्वर जमीन,
जल, खाद और प्रकाश,
जहाँ फिर से अंकुरित कर सकूँ इसे,
खोज रहा हूँ, हल-बैल, फावड़ा और कुदाल,
जिससे कर सकूँ इसकी सही देख-रेख,
और लहलहा सकूँ,
तुम्हारे मेरे मध्य खो गए इस मूक प्रेम की फसल।
-नीरज

0 टिप्पणी:
एक टिप्पणी भेजें