सोमवार, 3 दिसंबर 2012

बचपन


एक मद्धिम सा दिया जल रहा था,
दक्षिण वाले ताखे पर रखा हुआ,
जिसके नीचे नाना जी सोये हुए थे,
कोठरी और दक्षिण वाले ताखे के बीच,
आँगन था,
और ऊपर आकाश से पहले,
तेढ्वा आम की शाखाएं दिखती थी,
जिनके बीच से झिलमिलाता था,
हमारे बचपन का तारों से भरा,
साफ़ और इमानदार आसमान।

2)
हम कलकत्ते से गाँव आ गए थे,
खुशियाँ काफूर हो जाती थी,
घर पहुँचने के दो चार दिन बाद ही,
और जीवन फिर वैसा ही हो जाता था,
जैसे मेढ़ों की दहलीजों से बंधे खेत,
और छुट्टियाँ बीत जाती थी,
बड़कवा और छोटका(नीच) का भेद तलाशने में।

3)
वह हमारे यहाँ काम करती थी,
बारिन की बिटिया थी,
पूरे घर के बिखरे हुए बर्तन खोज खोज के वही धुलती थी,
बड़ी हो रही थी, कुछ निगाहें उसमे हमेशा कुछ न कुछ,
खोजा करती थी,
लेकिन वह हमारे घर को छोड़कर कहीं और जाती भी तो न थी,
फिर एक दिन सुबह सुबह, आनन् फानन में
घर के लोग उसे अस्पताल ले गए,
मैंने माँ से बहुत पूछा क्या हुआ,
माँ ने कहा था वो पेट से है,
अस्पताल से आने के बाद, उसकी शादी हो गयी,
लेकिन मैं उसका पेट ही देख रहा था,
मुझ जैसा ही तो था,
लेकिन भैया कई दिनों तक घर में न थे।

4)
हमारे बड़े से घर के बगल में उसकी छोटी सी झोपडी थी,
वह हमेशा द्वार पर ही बैठा रहता था,
बाँस की खपच्चियों से जाने क्या क्या बनाता था,
मैं छत से उसे रोज देखता था,
हमारी नज़रें मिलती,
और हम मुस्कुरा देते थे,
बाकी लड़कों की तरह वह हमारे साथ नहीं खेलता था,
बस दूर से हमें देखता था, खेलते हुए,
माँ ने बोला था वो नीच है,
लेकिन मैं चुपके से उसके पास चला जाया करता था,
और बाँट आता था उसके हिस्से का बचपन,
जो हमेशा उसकी झोपडी के द्वार पर,
बैठा रहता था, अकेला।

5)
आज कोई मेहमान आये हुए थे,
लेकिन ये कैसे मेहमान,
उन्हें पानी भी न पिलाया गया,
मैं दौड़ के बाहर गया,
नाना जी थे,
माँ उनसे मिली,
और वो फिर चले गए,
लेकिन मैं सोचता ही रह गया,
माँ ने बताया,
बेटी के यहाँ पानी भी नहीं पीते हैं,
क्या बेटियां अछूत होती हैं?
---------------------------------------------------------बचपन(1)

- नीरज

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