जी मेल की उस चैट पर उसने कहा था कि ठीक नहीं है, मैं सोचने लगा था कि ठीक तो बहुत कुछ नहीं है, ख्वाब अभी अधूरे हैं, रात अभी बाकी है और आसमान से टपकती ओस की बूंदें नहीं दिखती अभी लैम्पपोस्ट की रौशनी में, ठीक तो बहुत कुछ नहीं है, और कुछ शब्द यूँ उतर पड़े थे,
ठीक नहीं है,
क्या?
तुम,
या फिर मैं,
या फिर हमारे बीच पसरी ये दूरियां,
या बारिश में भीगते हुए,
आखों से गिरते गर्म आसूं,
दबा के रख आया हूँ उन्हें,
समंदर की लहरों के नीचे वाली रेत में,
जिन्हें अब वह बहा के,
किसी अनजाने शहर में पटक आया होगा,
अब बारिश में भीगते हुए आसूँ नहीं,
सुनहरे सपने गिरते हैं,
तुम्हारे और मेरे,
और भूल जाता है समंदर अपना खारापन,
जब उसकी एक चट्टान पर बैठी तुम,
अपना सिर धीरे से मेरे कंधे पर रख देती हो।।
-नीरज
ठीक नहीं है,
क्या?
तुम,
या फिर मैं,
या फिर हमारे बीच पसरी ये दूरियां,
या बारिश में भीगते हुए,
आखों से गिरते गर्म आसूं,
दबा के रख आया हूँ उन्हें,
समंदर की लहरों के नीचे वाली रेत में,
जिन्हें अब वह बहा के,
किसी अनजाने शहर में पटक आया होगा,
अब बारिश में भीगते हुए आसूँ नहीं,
सुनहरे सपने गिरते हैं,
तुम्हारे और मेरे,
और भूल जाता है समंदर अपना खारापन,
जब उसकी एक चट्टान पर बैठी तुम,
अपना सिर धीरे से मेरे कंधे पर रख देती हो।।
-नीरज
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5 टिप्पणी:
प्यारी और भावों से भरी रचना...
बहुत सुंदर नीरज जी .
वीणा जी आभार। राजीव जी शुक्रिया।
तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.
संजय जी हार्दिक आभार।
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