बुधवार, 25 सितंबर 2013

जी मेल की वह चैट

जी मेल की उस चैट पर उसने कहा था कि ठीक नहीं है, मैं सोचने लगा था कि ठीक तो बहुत कुछ नहीं है, ख्वाब अभी अधूरे हैं, रात अभी बाकी है और आसमान से टपकती ओस की बूंदें नहीं दिखती अभी लैम्पपोस्ट की रौशनी में, ठीक तो बहुत कुछ नहीं है, और कुछ शब्द यूँ उतर पड़े थे,


ठीक नहीं है,
क्या?
तुम,
या फिर मैं,
या फिर हमारे बीच पसरी ये दूरियां,
या बारिश में भीगते हुए,
आखों से गिरते गर्म आसूं,
दबा के रख आया हूँ उन्हें,
समंदर की लहरों के नीचे वाली रेत में,
जिन्हें अब वह बहा के,
किसी अनजाने  शहर में पटक आया होगा,
अब बारिश में भीगते हुए आसूँ नहीं,
सुनहरे सपने गिरते हैं,
तुम्हारे और मेरे,
और भूल जाता है समंदर अपना खारापन,
जब उसकी एक चट्टान पर बैठी तुम,
अपना सिर धीरे से मेरे कंधे पर रख देती हो।।

-नीरज 

5 टिप्पणी:

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

प्यारी और भावों से भरी रचना...

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुंदर नीरज जी .

Niraj Pal ने कहा…

वीणा जी आभार। राजीव जी शुक्रिया।

संजय भास्‍कर ने कहा…

तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.

Niraj Pal ने कहा…

संजय जी हार्दिक आभार।

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