गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

जब मुझे होना चाहिए था

गूगल से साभार

जब भी लगी होगी हलकी सी चोट,
तुमने झट से भर लिया होगा,
मुझे अपने आँचल से,
हर बल्लैया ली होगी तुमने मेरी अपने ऊपर,
कितने ही आंसू झरे होंगे तुम्हारे,
मेरी छोटी छोटी चोटों पर,
पर देखो,
आज मैं नहीं था,
नहीं था मैं,
जब मुझे होना चाहिये था,
तुम्हारे पास,
कितना दर्द हुआ होगा,
मुझे तो एहसास भी नहीं,
सिसकी होगी तुम,
शायद रोयी भी होगी,
लेकिन तुम्हारे आंसुओं को पोछने,
ना थे मेरे हाथ वहां,
बेबस मैं ही तो था,
तब भी,
और,
आज भी,
नहीं ले सका मैं तुम्हारी बलायें,
अपने सर,
सारा सब कुछ तुमने ही समेट लिया,
माँ,
झरे मेरे आँसूं भी,
पर किस काम के,
देख भी नहीं पा रहा तुम्हे,
कितना बेबस हूँ,
असहाय,
और,
निर्लज्ज भी,
नहीं था मैं,
जब मुझे होना चाहिए था,
तुम्हारे पास माँ।

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