बुधवार, 19 दिसंबर 2012

उठा लो हथियार

पता है तुम्हे,
सुनो कहाँ जाती हो,
रुको,
देखो तो सही,
क्यूँ नहीं देखती,
अपने आपको तुम?
बिखरी पड़ी थी तुम,
नग्न,
खून से सनी हुई,
दिल्ली की अधजली, खूंखार सड़कों पर,
नुची चुथी हुई,
जर्जर,
सुन लो,
अब भी कहता हूँ,
बार बार कहता रहा हूँ,
लेकिन तुम हमेशा टाल जाती हो,
मुझे नहीं पता,
कि उस समय क्या हुआ होगा तुम्हारे साथ,
क्या गुजरी होगी तुम पर,
किस यातना से दो चार हुई होगी तुम,
नहीं जाती वहां तक मेरी सोच,
लेकिन सिहरन के मारे,
रोयें रोयें खड़े हैं,
और कितना,
कब तक,
आँखों को सेंकती रहोगी,
छिड़कती रहोगी,
ज़ख्मों पर नमक,
कब तक,
नासूर बन चुके हैं ये अब,
पता भी है तुम्हे,
उठो,
बैठो मत,
चलो,
तुलसी के पास भी चलना है,
ताड़न की अधिकारिणी उसने ही बनाया है न तुम्हे,
लेकिन क्यूँ,
पूछो,
क्यूँ नहीं पूछती,
इंद्र से भी पूछना है,
कैसे ऋषि रूप में उसने अहिल्या(तुम्हे) को छला,
लाज न आई उसे,
या फिर लाज न आई उन्हें,
जिसने तुम्हे जार जार करके फेंक दिया,
जानवरों की तरह,
रुक जाओ,
सुन लो,
कब तक चलेगा यह सब,
सदियों से हो रहा है,
अभी भी चल रहा है,
यह कोई,
वंश वृक्ष नहीं है,
जो यूँ ही चलता रहेगा,
आज दिल्ली थी,
कल कोलकाता था,
मुंबई, पुणे, ठाणे, केरल, बंगलोर भी,
हर जगह,
तुम बिखरी हुई हो,
रुक जाओ,
सुन लो,
ये नासूर अब और न पकने दो,
आज माँ से नज़र नहीं मिला पाया था,
बहन को देखने में शर्म महसूस हो रही थी,
और पत्नी के साथ चलने में डर लग रहा था,
इसीलिए कहता हूँ रुक जाओ,
और,
त्याग दो सीता का रूप,
तज दो अहिल्या को,
और कर लो धारण,
फिर से,
काली को,
बन जाओ तुम दुर्गा,
और पी लो रक्त इन रक्त पिपासुओं का,
डाल दो उनके हलक में हाथ,
और निकाल कर फेंक दो उनके संवेदनहीन ह्रदय को,
मार डालो, उठा लो हथियार,
नहीं तो,
सच कहता हूँ,
वह दिन दूर नहीं,
जब मैं भी नहीं रहूँगा कहने के लिए,
दाग दी जाएगी मेरी जिह्वा,
और लेखनी को तुम्हारे ही शव पर,
रखकर जला दिया जायेगा,
फिर नहीं रुकेगा यह ताण्डव,
और नुचती रहेगी, जलती रहेगी, बनती रहेगी शिकार,
हर माँ,
हर बहन,
हर बेटी
और हर बीवी,
सरेआम भरी महफ़िल में,
और कोई कृष्ण नहीं होगा तब,
लुटती हुई द्रोपदी को,
बचाने के लिए,
बन जाओ तुम दुर्गा,
बन जाओ काली,
बन जाओ,
सुन लो,
रुक जाओ,
उठा लो हथियार,
और काट डालो,
इन देव रुपी दानवों को,
रुक जाओ।

-नीरज

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