गूगल से साभार
और दौड़ चले कई पाँव,
मिलना सिर्फ एक को ही था,
पतंग की तो आज किस्मत ही खुल गयी थी,
लहराती हुई, चिढाती हुई,
वह चल पड़ी,
दीवालें, छत, पेंड-पौधे,
फर्लान्गती हुई,
लेकिन यह क्या,
वह तो किसी को न मिली,
चुपचाप मेरे छत पर,
अपने सर को रखकर सो गयी,
देखती रह गयीं कुछ निगाहें,
और मुझे गरियाते हुए मुड़ गए कुछ पैर वापस,
फिर एक दिन,
बारिश से भीगी हुई,
तर-बतर मिली थी मुझे वो,
पतंग,
भीगे हुए परों के साथ,
उड़ने को फिर व्याकुल।
- नीरज

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