शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

----------​----------​-बचपन/3

गूगल से साभार 

1)
बस थोडा थोडा ही याद आता है उनका चेहरा,
पापा ने कहा था ये तुम्हारे परदादा हैं,
हिम से भी ठंढ़े झुर्रियों से भरे हुए पैरों को,
छूते हुए सिहर गया था मैं,
पर उनके हाथ बड़े अजीब से लाल लाल थे,
मैंने पापा की तरफ देखा,
पापा ने कहा हम पहले इतने बड़े न थे,
दादा ने पान बेचकर खड़ा किया है यह सब कुछ,
मैं बहुत देर तक उनको और हमारे बड़े घर को देखता रहा था,
और उनके हाथ की तरह,
घर भी कत्थे की ही तरह लाल हो गया था।

2)
एलबम में एक खुबसूरत सी फोटो लगी हुई थी,
श्वेत श्याम।
मैं उनको न जानता था,
माँ से पूछने पर पता चला था कि,
वो हमारे दादाजी थे,
बहुत देर तक रोया था मैं,
उनके फोटो को देख देख कर,
कि क्यूँ नहीं मिल पाया मैं उनसे,
पर अब उन्हें देखकर रुलाई नहीं आती,
दुनिया हमेशा श्वेत श्याम थोड़े ही रहती है।

3)
वो हमारे खेतों की देखरेख करते हैं,
फसलें उगाना, और फिर हमारे यहाँ दे जाना,
यही उनका काम है,
लेकिन जब कभी वो हमारे यहाँ खाते हैं,
तो ज़मीन पर बैठ कर,
और उनके बर्तन भी अलग होते हैं,
जिन्हें कोई नहीं छूता,
नानी ने कहा था वो अछूत हैं,
उनका छुआ नहीं खाते,
लेकिन हमारे सारे अन्न और फसलें,
वो तो उनका ही छुआ हुआ होता है?
नानी ने कुछ नहीं बोला,
मेरा हाथ पकड़ा और घर के अन्दर लेके चली गयीं थी।

4)
ननिहाल में एक बाग़ हुआ करता था,
और उसके बीचोबीच एक पीपल का पेंड,
और किनारे एक कुआँ,
मौसी कहती थी,
कि कुएं की शादी पीपल से हुई है,
और सच में पीपल की जडें पूरे कुएं में थी,
और लटकते हुए उसके पानी से जा मिलती थी,
हमारे लिए ये कौतूहल हुआ करता था,
आज वहां वो कुआँ नहीं है, ना ही बागीचा,
एक सड़क जाती है वहां से,
लेकिन पीपल का ठूंठ अब भी वहीँ किनारे पड़ा हुआ है,
समय की परतों में अपने,
अकेलेपन की उपस्थिति दर्ज कराता हुआ,
क्या कुआँ भी वहीँ आस पास होगा ठूंठ सा ही सही,
लेकिन अब मुझे नहीं दिखता,
शायद पीपल को दिखता हो।

5)
हम कलकत्ते में थे उस समय,
जब वह तार आया था कि,
दादी अब नहीं रही,
माँ की आँखों में आंसू थे और पापा स्तब्ध,
लेकिन ट्रेन की टिकट पाँच दिनों के बाद की मिली,
घर में अब खाना रोज़ की तरह न बनता था,
छौंका नहीं लगता, और न ही तेल,
हल्दी भी खाने में से गायब हो गयी थी,
माँ ने बताया था कि ये छुतका है,
जो क्रिया कर्म होने के बाद ख़तम हो जायेगा,
तब तक ऐसा ही खाना मिलेगा,
मैं सोचता ही रह गया कि,
हजारों मील दूर भी क्या कोई छुतका आ सकता है,
यूँ चुटकी बजा के,
जबकि हमें तो अभी टिकट भर मिली है।


-नीरज

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