उस शहर की पगडंडियां भले ही खो गयी हों,
तारकोल की कालिख में,
पर धूल अब भी याद करती हैं,
तुम्हारे पगों के निशान,
जो बना आई थी तुम उनके दिलों पर,
गिरती हुई ओस,
अब भी गुमती है,
तुम्हारे सांसों की गर्म एहसासों के बीच,
भले हो खो गयी हो वो,
खेतों की पुरवाई,
पछुआ अब भी तुम्हारी राह देखती है,
मिटते पैरों के निशानों में,
गुमशुदा नहीं है शहर,
न ही मिटा है,
बस खोज रहा है,
तुम्हारी भटकती हुई आँखों में,
अपने निशान।
-नीरज

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