गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

साँकल गवाह है कुछ भी गया नही !!


साँकल गवाह है कुछ भी गया नही !!
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बंद है मजबूत तालों के पीछे,
यादें,
धरोहरों में तब्दील होतीं,
खंडहर बनती,
दीवारों में रिसती,
ताकती अब भी रास्ता,
कि, बदलेगा समय, बदलेगी नियति,
और मंद हवा का झोंका,
एक बार फिर हरा कर देगा,
सीलती यादों को,
और खंडहर फिर जाग उठेंगे,
फिर होगा कलरव,
और उड़ जायेंगे,
कबूतर,
गुम्बदों से।
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साँकल गवाह है कुछ भी गया नही !!


-नीरज 

6 टिप्पणी:

virendra sharma ने कहा…

बहुत सशक्त बिम्ब और रूपक संजोया है -कुछ गया नहीं है ताला गवाह है।

Niraj Pal ने कहा…

हार्दिक आभार विरेन्द्र जी।

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : लुंगगोम : रहस्यमयी तिब्बती साधना

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना|
latest post महिषासुर बध (भाग २ )

Niraj Pal ने कहा…

हार्दिक आभार राजीव जी।

Niraj Pal ने कहा…

हार्दिक आभार कालीपद जी।

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