साँकल गवाह है कुछ भी गया नही !!
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बंद है मजबूत तालों के पीछे,
यादें,
धरोहरों में तब्दील होतीं,
खंडहर बनती,
दीवारों में रिसती,
ताकती अब भी रास्ता,
कि, बदलेगा समय, बदलेगी नियति,
और मंद हवा का झोंका,
एक बार फिर हरा कर देगा,
सीलती यादों को,
और खंडहर फिर जाग उठेंगे,
फिर होगा कलरव,
और उड़ जायेंगे,
कबूतर,
गुम्बदों से।
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साँकल गवाह है कुछ भी गया नही !!
-नीरज

6 टिप्पणी:
बहुत सशक्त बिम्ब और रूपक संजोया है -कुछ गया नहीं है ताला गवाह है।
हार्दिक आभार विरेन्द्र जी।
बहुत सुन्दर .
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बहुत सुन्दर रचना|
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हार्दिक आभार राजीव जी।
हार्दिक आभार कालीपद जी।
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