गूगल से साभार
कल बैठा हुआ था जब,
सब कुछ छोड़ छाड़ के,
दीन दुनिया से बेखबर,
अपने सपनों के संसार में,
तुम आई थी मेरे सिरहाने,
मेरे बालों को छुआ था,
देखा था मेरी आँखों में,
और चली गयी थी,
बंद आँखें क्या कुछ कहती हैं?
नहीं पता मुझे,
लेकिन तुम मेरी बंद आँखों से होते हुए,
उतर आई थी मेरे सपनों में,
रेत सी झरती हुई,
और मेरे इतने करीब थी,
जितना कभी जागते हुए भी ना थी,
और फैली हुयी थी,
मेरी परछाई बनकर उजालों के पार,
प्रश्न बनकर,
झुकी हुई थी तुम मेरी धुरी पर,
और मैं पृथ्वी सा घूम रहा था,
अंधेरों और उजालों के पार तुम्हारे प्रश्नों का हल,
ढूंढता हुआ,
हिमनदियों में पिघलता हुआ,
धरती के गर्भ में उबलता हुआ,
नदियों के साथ बहता हुआ,
समुद्र में लहराता हुआ,
मैं ढूंढ रहा था,
तुम्हारे प्रश्नों के हल,
सपनों के रेतीले संसार में,
तब तक तुम प्रणय से सरोबार,
हवा बनकर मेरे ऊपर झुक गयी थी,
और मेरी आँखें सपनों से यथार्थ में,
आकर,
सिमट गयी थीं तुम्हारी आँखों में,
पर शायद खोज रही थी अब भी,
तुम्हारे प्रश्नों के हल,
जो अभी भी तुम्हारी आँखों में,
दृष्टिगोचर था,
प्रणय की इस मधुबेला में भी।
-नीरज
सब कुछ छोड़ छाड़ के,
दीन दुनिया से बेखबर,
अपने सपनों के संसार में,
तुम आई थी मेरे सिरहाने,
मेरे बालों को छुआ था,
देखा था मेरी आँखों में,
और चली गयी थी,
बंद आँखें क्या कुछ कहती हैं?
नहीं पता मुझे,
लेकिन तुम मेरी बंद आँखों से होते हुए,
उतर आई थी मेरे सपनों में,
रेत सी झरती हुई,
और मेरे इतने करीब थी,
जितना कभी जागते हुए भी ना थी,
और फैली हुयी थी,
मेरी परछाई बनकर उजालों के पार,
प्रश्न बनकर,
झुकी हुई थी तुम मेरी धुरी पर,
और मैं पृथ्वी सा घूम रहा था,
अंधेरों और उजालों के पार तुम्हारे प्रश्नों का हल,
ढूंढता हुआ,
हिमनदियों में पिघलता हुआ,
धरती के गर्भ में उबलता हुआ,
नदियों के साथ बहता हुआ,
समुद्र में लहराता हुआ,
मैं ढूंढ रहा था,
तुम्हारे प्रश्नों के हल,
सपनों के रेतीले संसार में,
तब तक तुम प्रणय से सरोबार,
हवा बनकर मेरे ऊपर झुक गयी थी,
और मेरी आँखें सपनों से यथार्थ में,
आकर,
सिमट गयी थीं तुम्हारी आँखों में,
पर शायद खोज रही थी अब भी,
तुम्हारे प्रश्नों के हल,
जो अभी भी तुम्हारी आँखों में,
दृष्टिगोचर था,
प्रणय की इस मधुबेला में भी।
-नीरज
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