भाई तुम नाराज़ क्यूँ हो...
क्या सिर्फ इसलिए कि मैंने सारे बंधन तोड़ दिए..रिवाजों के...
क्युंकी रूढ़ियों में जकड़ी संस्कृति मुझे न बांध पाई
और जात-पात, भेद-भाव से परे मैंने अपनी दुनिया बसानी चाही...
एक ऐसी दुनिया जहाँ ईश्वर मानवीय संवेदनाएं और भावनाओं का नाम हो...
न कि हमारे हिसाब से उकेरी गयी विशाल गगन चुम्बी हिमालयन मूर्ति...
जिसके होठों से बोल नहीं फूटते...मौन सी विराजमान...
भाई क्या तुमने कभी प्रेम न किया...
कभी किसी के जुड़ों में फूल न लगाये...
भावनाओं के सागर में क्या तुमने कभी भी गोते न लगाने चाहे...
चाहा भी होगा तो इन सामाजिक रुढियों ने शायद तुम्हारे पाँव बांध लिए होंगे...
औए भेज दिया होगा वापस उसी गर्त में जहाँ तुम आज हो,,,
भाई बुरा न मानना लेकिन मुझे सदैव ये गर्त ही लगा...
जहाँ तुम तने खड़े रहते हो...हमेशा की तरह उर्जावान,,
लेकिन मुझमे उर्जा नहीं है भाई...
क्यूंकि मैं उर्जा का उत्पादक नहीं उपभोक्ता हूँ..
तुम जिस उर्जा से सदैव गतिमान रहते हो मैं उसकी गर्मी से
अपनी स्मृतियों के पतीले की चाय सेक लेता हूँ....
और हो लेता हूँ संतुष्ट कि अच्छा है मैं हिमालय नहीं हूँ...
तुम्हारी तरह....जहाँ सिर्फ लोगों के हाथ उठते हैं पैलगी करने के लिए...
भय से या फिर तुम्हारी भव्यता से...
मुझे अवशिष्ट अरावली ही रहने दो..झुका हुआ....कुचला हुआ...
जहाँ जब तब मुझे काटकर सड़कों का निर्माण हो जाये...
और जोत दिए जाएँ मुझ पर हजारों बुलडोजर और न जाने क्या क्या....
सिर्फ इसीलिए कि मैं नतमस्तक हूँ...भावनाओं का भूखा हूँ....
जहाँ मेरे ऊपर हजारों पेड़ अपनी शीतल छाया से मुझे झुलसाते रहे....
और चाँद अपनी चांदनी में अट्टालिकाओं में छुपकर
मेरे साथ लुका छिपी का खेल खेलता रहे.
इसीलिए मुझे वो गर्त नहीं.....अवशिष्ट ही प्यारा है...
भाई तुम नाराज़ क्यूँ हो....
क्या इसलिए कि मैं प्रेमी हूँ....
या फिर इसलिए की मेरा प्रेम तुम्हारी महत्वाकांक्षा पूरी नहीं कर सकता,
और नहीं कर पायेगा तुम्हे प्रतिष्ठित तुम्हारे उस समाज में...
जहाँ प्रेम नाम कि कोई चीज़ होती ही नहीं...
सिर्फ होती हैं हवशी निगाहें और पैसे की भूख...
जहाँ प्रेम शरीर है, वासना है ....और अपनी रसूख दिखाने का साधन...
भाई फिर तो अच्छा है कि मैं वहां नहीं हूँ.....
भाई लेकिन तुम नाराज़ क्यूँ हो....
क्या सिर्फ इसलिए कि मैंने किसी के स्नेह को अपनी जुबान दे रखी है...
क्यूंकि उसके साथ मैं सिर्फ मैं होता हूँ....कोई दिखावा नहीं छलावा नहीं...
क्या सिर्फ इसलिए क्यूंकि वो हमारी जाति में नहीं आती....
और तुम्हारे दंभ को चकनाचूर कर देती है....
जो तुमने पाल रखी थी मेरे लिए, अपने रसूख के लिए...
अपने उस बनावटी समाज के लिए...
जो मगरमच्छी आंसू बहता है तुम्हारे सामने...
औए पीठ पीछे गालियाँ बकता है...
क्या उसके लिए हो तुम मेरे प्रेम के खिलाफ....
जो अपने ही घर कि बहू बेटियों को अपने ही घर में नुचवाता है...
और भरी पंचायत में उन्हें चुड़ैल और डायन करार करके...
पत्थरों से मरवाता है.....
किस समाज की बात करते ही भाई....उस समाज की...
जो आज भी सोलहवीं सदी में रहता है...
और औरत को अपने पैर की जूती समझता है....
और उसको तारन की अधिकारी बताता है...
जबकि शक्ति की पूजा करता है.....सीता को माता....
और दुर्गा को जगत जननी कहता है....उस समाज की बात करते हो....
जहाँ बच्ची को पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता है....
भाई फिर तो अच्छा है कि मेरा प्रेम इन सबसे परे है....
भाई पर तुम नाराज़ मत हो....
मुझे पता है कि तुम्हारे उसूल गवारा नहीं करेंगे मुझे क्षमा करने को...
पर भाई बचपन में जब तुम मेरे आंसुओं को चाट कर मुझे मनाते थे...
पेंड कि सबसे ऊँची डाल से पका हुआ आम जब मुझे खिलाते थे...
मुझे अपनी गोद में लिए हुए करीमन करीमन चिल्लाते थे...
क्युंकी मेरा रंग सांवला था...और तुम मुझे इसी नाम से बुलाते थे...
भाई वो स्नेहिल मुस्कान जो तुम्हारे होठों पे रेंग जाया करती है ,
और गर्व से तुम्हारा सीना जब चौड़ा हो जाता है....मेरे गुणगान में....
और उस समय तुम्हारी आँखों में दिखाई देती वो ममता....
कहाँ से लाऊंगा मैं....भाई तुम नाराज़ मत होना...
दुनिया की तरह भावविहीन मत होना....
भाई तुम नाराज़ मत होना...
-नीरज
0 टिप्पणी:
एक टिप्पणी भेजें