सोमवार, 3 दिसंबर 2012

रोजमर्रा

1)
चोर तो मेरा मन था,
जो चुपके से आ बैठा था,
मेरे और तुम्हारे एहसासों के बीच कहीं,
लाख चाहा बचना इससे,
पर तुम्हे फोन करते हुए,
यह फिर आ गया था,
कुछ नमियां चुराने,
मेरे, तुम्हारे/ अरे नहीं
------------------------हमारे।

2)
अभी अभी तो छोड़ के आया हूँ तुम्हे,
फिर भी तुम मेरे साथ हो,
क्या कुछ पल अकेला भी नही रह सकता,
नहीं नहीं मैं तुम्हे कोस नहीं रहा,
मैं तो बस,
बस यूँ ही ...........
कुछ बहाने तलाश रहा था,
तुम्हारे और मेरे एक साथ होने पर,
होने वाली कुछ बातों की,
क्यूंकि यह मन भी ना .......
अब क्या बताऊँ/ बस वजहें तलाशता है,
कुछ होने की,
या फिर न होने की,
अरे तुम कहाँ गयी?
अभी तो यहीं पर थी।
 
3)
सोचता हूँ,
तुम्हे एक पत्र लिखूं, प्रेम पत्र !
जो कभी नहीं लिख पाया मैं तुम्हे,
उसमे वो सब लिखूं,
वह सब, जो कहीं छूट गया,
एस एम एस के आधे अधूरे शब्दों में,
और मोबाइल पर बात करते वक़्त,
कट गए टॉक टाइम में,
सोचता हूँ कि लिख दूँ एक गुलाब,
जिसे तुम छिपा के रख लो अपनी किताब में,
और देखा करो, जब मैं,
ना रहूँ आस पास,
लेकिन गुम हो गयी है कहीं,
दावात की रोशनाई,
इ मेल सी भागती दौड़ती इस ज़िन्दगी से।
4)
पता है आज छुट्टी मिली है,
कल इतवार है,
सोचता हूँ, क्यूँ न मैं और तुम/ हम
फिर मिल बैठ के एक साथ खाएं,
और गायें, भूली बिसरी यादों के गीत,
कभी न खत्म होने वाली काम भरी यह ज़िन्दगी,
जाने कब हैंग हो जाये कंप्यूटर की तरह।

--------------------------------------------------रोजमर्रा (1)
 
- नीरज

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