चित्रकृति: गूगल सर्च से साभार
मुझे स्त्री नहीं बनना,
हाँ मुझे औरत नहीं कहलाना,
नहीं जनना मुझे उस संसार में,
क्या पता मैं अजन्मी ही रह जाऊं,
मार दी जाऊं जन्म लेने से पहले ही,
सिर्फ इसलिए,
क्यूंकि मैं स्त्री हूँ।
मैं स्त्री हूँ,
मैं सिर्फ जन सकती हूँ,
ढो सकती हूँ आज्ञाओं के बोझ,
और न चाहते हुए भी मुस्कुराना मेरी नियति है,
हाँ! क्यूंकि मैं स्त्री हूँ,
नहीं मांग सकती मैं अपने अधिकार,
अपने साथ साथ जीती हूँ मैं कई जानें, एक साथ,
लेकर घूमती हूँ अपने साथ मान-सम्मान,
सिर्फ अपना नहीं बल्कि पूरे परिवार का, समाज का,
मैं सिर्फ खूंटे में बंध सकती हूँ,
बंद हो सकती हूँ कमरे की चारदीवारी में,
मेरे चाहने और न चाहने से कोई फर्क नहीं पड़ता,
मैं सिर्फ भोग की वस्तु हूँ,
अवांछित,
क्यूंकि मैं स्त्री हूँ।
कंधे से कन्धा मिलाकर मैं सिर्फ खड़ी हो सकती हूँ,
चल नहीं सकती,
ज़ाहिर नहीं कर सकती अपने विचार,
मैं खूबसूरत नहीं हो सकती,
यह मेरा अभिशाप है,
क्या पता कल तेजाब फेंककर कब छीन ली जाये मेरी यह खूबसूरती,
क्यूंकि मैं इंकार नहीं कर सकती,
मेरे ह्रदय में नहीं बन सकती कोई तस्वीर मेरी इच्छाओं की,
मैं रास नहीं रचा सकती,
क्यूंकि मैं कृष्ण नहीं हो सकती,
मुझे राधा बनकर जलना ही होगा विरह बेदना में,
क्यूंकि मैं स्त्री हूँ।
मैं लड़की हूँ, औरत हूँ,
सिर्फ इसीलिए मुझे सहने हैं सारे अत्याचार चुपचाप,
मैं देवी हूँ,
सिर्फ मंदिरों में, पोस्टरों में,
नहीं तो मैं चुड़ैल हूँ, डायन हूँ,
क्या पता कब कहाँ चला दिए जायें मेरे ऊपर पत्थर,
और नोच डाला जाये भरी पंचायत के बीच,
सिर्फ और सिर्फ इसलिए,
क्यूंकि मैं स्त्री हूँ।
इसीलिए,
मुझे स्त्री नहीं बनना,
हाँ मुझे औरत नहीं कहलाना,
नहीं बनना मुझे दहलीजों की चौखट,
नहीं उबलना मुझे गर्म दूध के कड़ाहों में,
और नहीं देना मुझे सैकड़ों कुर्बानियां,
सिर्फ इसलिए,
कि,
मैं स्त्री हूँ।
-नीरज

0 टिप्पणी:
एक टिप्पणी भेजें