शनिवार, 17 नवंबर 2012

दो लब्ज़...

बस दो लब्जों की है ज़िन्दगी ,
एक में शुरू और दुसरे में ख़तम।
भटकती है, सिसकती है, न जाने किसकी तलाश में,
सुसताती हुई नीम के नीचे, बचपन की यादों से खुशियाँ बुनती हुई,
मिलने, बिछड़ने का दर्द, इमली की खट्टी पत्तियों से,
अपना वज़ूद तलाशती हुई, साहिल के किनारे पड़े हुए कांच की शीशी में झांकती हुई,
खोजती रहती है हर पल वो एक क्षण, जिसमे उसके टुकड़े कभी जुड़े हुए थे,
कंकडों के कैनवास पर बनी हुई पेंटिंग 
पर बिखरे हुए रंगों की तरह।
सपनों के ग़ज़लों से सुरों की ताल में राग खोजते हुए,
ज़िन्दगी खोजती रहती है, सिरहाने पर रखी हुई चाय के प्याले को,
तुम्हारी जुल्फों से टपकती हुई पानी की बूंदों में अपने अख्श की छाप को,
और रात आकाश में निकले हुए चाँद के दाग में, अपने दो लब्ज़।

-नीरज

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