गुरुवार, 1 नवंबर 2012

पेशोपेश......




सच कहूँ तो कुछ लिखने को दिल कर रहा है आज,
पर पता नहीं क्यूँ लिख नहीं पा रहा हूँ,
कुछ भाव बहने को व्याकुल हैं...
लेकिन पता नहीं क्या...है जो इन सबके ऊपर आकर बैठ जाता है...
और मेरे भाव अनमने से ही सही लेकिन दब जाते हैं,
और हवा के चलने पर सूखी हुई पत्ती जैसे ईंट के नीचे फरफरा कर दम तोड़ देती है...
कुछ वैसा ही हाल मेरे मन में चल रही भावनाओं का है...
एक अजीब सी उथल पुथल मचा रखी है इन्होने मेरे मन मानस में...
चिल्लाता हूँ भी तो डर है कि कहीं सुन न लिया जाऊं और
कहीं चस्पा न कर दिए जायें मेरे भी सर पर कुछ बेहूदे से इल्जाम,
और खड़ा कर दिया जाये उन उल्लुओं कि क़तर में जिनके सर चारो तरफ चकरघिन्नी कि तरह घूमते हैं...
और कहीं ऐसा न हो कि इस चुप रहने की सजा में भी  मेरे ऊपर लगा दी जायें...
कुछ अपराधिक दण्ड धाराएं...और बंद कर दिया जाऊं बिना किसी अपराध के ही,
अजीब पेशोपेश है,,,,
आप तो समझ ही रहे होंगे मेरी इस विवशता को.....
और सच कहूँ तो यह शायद मेरे अकेले की ही नहीं,
बल्कि हरेक आम आदमी की विवशता का मानस है यह.

-नीरज 

( चित्रकृति : गूगल से साभार )



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