अल सुबह एक खबर ने अनेकों भारतियों को राहत दे दी,
चला गया वह, अब दोजख में गया या जन्नत ये नहीं जानता हूँ,
और सच पूछिए तो न ही जानने की ऐसी कोई इच्छा शेष है,
कहीं ख़ुशी है तो कहीं दुःख भी, ख़ुशी इस बात की है कि चलो,
अब दिल पर सांप नहीं लोटेंगे और न ही होंगी गहमागहमी बहसों की,
बस इस एक खबर ने पिछले चार सालों से चली आ रही बहस को अचानक ही एक विराम दे दिया।
लेकिन वास्तविकता में क्या ये बहस बंद हो गयी है?
क्या इस एक कसाब के मर जाने से या लटक जाने से और कसाब पैदा न होंगे?
क्या कसाब सचमुच मर गया है? या फिर कहीं न कहीं हमारे दिलों में आज भी ज़िन्दा है?
शाम ढलते सूरज को देखते समय बार बार कसाब ज़िन्दा था मेरे ख्यालों में,
मरने के बाद उसे दफनाना भी हमें ही है, क्यूंकि उसके देश ने उसके शव को लेने से मना कर दिया है,
क्या विडम्बना है? या सच पूछिए मेरा प्रश्न आज यह है कि क्या यही जिहाद है?
क्या वाकई कसाब खुदा के पास पहुँच चुका है, और जन्नत की अप्सराओं के साथ चाय की चुस्कियां ले रहा है?
क्या उसके आकाओं में से कोई भी यह बात सरेआम कबूल कर सकता है?
अगर हाँ तो आज से मैं भी एक जिहादी हूँ।
(दो)
पाकिस्तान के पंजाब के फरीदकोट की दो बूढी आँखों में आज आंसूं थे,
जो गिरना तो चाहते थे, लेकिन न जाने आँखों से निकलकर आँखों में ही कहीं विलीन हो जाते थे,
धडकनें चल रही है और लब्जों में कुछ दुआएं, जिन्हें होठों से निकलने की आज़ादी पर खुदा के पहरे हैं,
लेकिन फरकते होठों और आँखों की तंगी सब कुछ कहे देती है,
अभी कुछ बरस ही तो बीतें हैं, जब ईद के दिन छोटे ने नए कपड़ों की ज़िद की थी,
घर के पैबन्दों में सीलन थी और जेबों में निठल्ले सिक्के भी न छनछनाते थे,
और छोटे की जिद कभी पूरी ही न हो सकी।
जब एक दिन छोटे ने नमाज़ अता की और कहा जा रहा हूँ खुदा के पास,
उसके बताये रास्ते की पैरवी करने, भला कौन बाप करता मना,
कुछ पैसे भी दिए उसने और कहा कि अगर मेरी गैरमौजूदगी में कभी जरुरत पड़े तो अल्लाह के बन्दों को याद करना,
कभी कमी न होगी, ये जिहाद है, जहाँ में सिर्फ अमन होगा,
फिर कई लाशों के ऊपर चलते हुए अख़बारों में छपी तसवीरें जब आयीं, तो अल्लाह का कोई भी बन्दा न आया,
घर में फिर से वही सीलन थी, जेबों का निठल्लापन और पेट में भूख,
लेकिन अमन ने साथ छोड़ दिया था, अब तो हूक सी उठती थी सीने में हर वक़्त,
पहले मुफलिसी में भी शांति थी, लेकिन अब मुफलिसी तो थी ही,
मजलिसों में भी कहीं उसका नाम न था, दुआओं में ही केवल था वह,
लेकिन होठों पर वह अंजान था, घर से उसकी पहचान तक गायब कर दी गयी थी,
और आज तो वही गायब हो गया, जिहादी था अल्लाह के पास गया होगा,
लेकिन मयस्सर न हुई इत्मिनान से छै गज़ ज़मीन भी,
और सर्द सी बूदें आँखों से गिरकर खौफ के समंदर में गायब हो गयीं।
-नीरज

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