बुधवार, 28 नवंबर 2012

***तुम***

चित्रकृति: गूगल सर्च से साभार 



कल पहाड़ों पर गया था,
चिनार, देवदार, अमलतास, गुलमोहर सबसे,
तुम्हारा पता पूछने,
तुम वहां नहीं मिले।
थोडा और आगे बढ़ गया,
जहाँ हिमनदियां धसक रही थी,
और इठला इठला के जल के टुकड़ों में बदल जाती थी,
अपने नीचे पत्थरों को काटते हुए,
फिर दूर तलक घसीट के उन्हें ले जाके पटक देती थी किन्ही किनारों पर,
अयाचित, अवांछित सा, सूरज के निचे चिर काल तक धूप सेंकने के लिए,
मैंने डरते डरते उनसे भी तुम्हारे बारे में पूछा,
तुम वहां भी नहीं मिले।
फिर पहुँच गया मैं उस चोटी पर,
जहाँ से सब कुछ दिखता है चीटियों की मानिंद रेंगता हुआ सा,
गगन को चूमता हुआ सा,
दिख रही थी वहां से ही बगल के घाटियों की घासनियाँ भी,
हाथों में अपना चिर परिचित औजार लिए हुए,
मुठ्ठियों में भर भर कर घासों को काटते हुए,
बतियाती जाती थी न जाने अपने किन ज़ख्मों को,
और गिरती पड़ती सर पर रखे गठ्ठर को लिए चढ़ जाती थी,
कितनी उचाईयां,
मैंने उनसे भी जानना चाहा तुम्हारा पता,
पर,
तुम वहां भी नहीं मिले।

फिर चल पड़ा,
तुम्हे खोजना तो था ही मुझे,
सुरंगों, गुफ़ाओं और घाटियाँ पार करता हुआ,
ठिठकते थे जब पैर,
तो सुस्ता लेता था,
पहाड़ों की हवाओं को सोखता हुआ,
और घिर आये कुहासों से नमीं चुराता हुआ,
मैं चलता ही रहा,
झरझर कलकल उफनती हुयी नदियों में,
जिनसे एक बार काल भी डर जाये,
उनको चीरता हुआ,
अपनी राफ्ट के सहारे,
औरों को भी लिए हुए,
उनकी उफनती धाराओं का सर कुचलते हुए,
मैंने उनसे भी तुम्हारा पता पूछा,

अब ज़वाब देने लगा था मेरा मानस,
लेकिन मैं हारने वालों में से नहीं,
खोज कर रहूँगा एक दिन तुम्हे,
तुम भले कहीं छुप जाओ,
मेरे विचलित मन।

-नीरज 

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