सुबह की खूबसूरती और मस्त हवा की ठंढी सी थाप,
आकाश में चौकड़ियाँ मारता हुआ पक्षियों का समूह,
और गौरैया ........................................................?
यादों के किसी कोने में बस याद सी रह गयी है तुम्हारी ,
जब रोशनदान से झाँककर चुपके से फुद्फुदाती हुई,
आँगन में बिखरे हुए दाने चुग जाया करती थी,
मुर्गा बांग भले ही न दे, लेकिन तुम नित्य आके जगा ही दिया करती थी,
गौरैया .......तुम कहाँ चली गयी,
कहाँ खो गयी तुम या तुम भी शिकार बना दी गयी प्रगति के मापदंडों की?
फुर्र हो गयी तुम नज़रों से कुछ ऐसे जैसे बचपन चला गया,
डूबते हुए क्षितिज में सूरज के ऊपर लहराती हुई तुम खो गयी,
सूरज के ही लाल लावे में, लेकिन सच कहता हूँ,
मानवों को तुम्हारे दर्द की तनिक भी परवाह न हुई,
लेकिन मेरे बचपन की यादों में तुम आज भी फुदक जाया करती हो,
और दे जाती हो अपनी स्नेहिल मुस्कान का अदना सा नजराना,
जो खत्म होगा अब मेरे साथ ही,
मुझे सच कहूँ तो अपनी फिक्र नहीं,
लेकिन अपने बच्चों को तुम्हे दिखने के लोभ से मैं सदा के लिए वंचित हो गया हूँ,
गौरैया................................................................।
-नीरज

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