एक अजीब सी उधेड़बुन में हूँ,
कहीं कुछ है जो बार बार मन के बंद दरवाज़े पर दस्तक दे जाता है,
यह धूप का एक टुकड़ा है,
या फिर रजाई में दुबका जाड़ा,
पेड़ों से टपकती ओस की बूंदें भी हो सकती हैं,
या फिर आने वाले तूफ़ान से पहले का जानलेवा सन्नाटा?
कुछ तो है अनचाहा सा,
जो लगातार घुसता ही जा रहा है मानस में कहीं दूर तक,
लेकिन मैं असहाय हूँ,
अरावली के पत्थरों की तरह,
हिमालय, अल्पस और फूजी की तरह,
जहाँ जब तब इच्छानुसार सुरंगें, मकान और होटल बना लिए गए,
पूछा भी नहीं कि तुम क्या चाहते हो?
बस घुसे चले आये घुसपैठियों सा,
और बसा लिया अपना संसार,
शोर और रौशनी से भरा पूरा।
मैं असहाय हूँ,
गंगा, टेम्स, अमेज़न और नील की तरह,
काट कर निकाल ली गयीं मुझसे जाने कितनी नहरें,
और तो और अपने तज्य भी मुझमे ही तज दिए,
पूछा भी नहीं कि,
क्या तुम्हे मैले होने से परहेज है?
मैं असहाय हूँ,
आसाम, अफ्रीका, अमेरिका और फिजी के जंगलों की तरह,
जब तब मुझे काट कर खड़े कर लेते हैं नए भूखण्ड,
और तोड़ आते हैं सदियों से फैले मेरे सन्नाटे को,
पूछते भी नहीं कि क्या दर्द तुम्हे भी होता है?
मैं असहाय हूँ,
मजदूरों, आदिवासियों और अनाथों की तरह,
जल, जंगल, ज़मीन कुछ भी नहीं है मेरा,
मैं खड़ा हूँ इतिहास के दोराहे पर,
मानवता की भीख का कटोरा लिए,
इंसानियत के दरवाज़े पर दस्तक देता हुआ,
इस इंतज़ार में कि कभी तो पिघलेगी,
हिमालय की बर्फ,
कभी तो उफ़ कहेगी गंगा,
हाथ बढाकर रोक लेंगे वृक्ष,
कुल्हाड़ी लिए काटते हाथों को,
और धरती कठोर होकर रोक लेगी उसे चीरते बुलडोज़रों को,
और सो जायेगा जंगल फिर से अपनी मस्त नींद में,
हरियाली की धूप का सपना देखता हुआ,
तब तक भविष्य की सुनहरी चमचमाती धूप का सपना लिए,
मुझे खड़ा रहना पड़ेगा यूँ ही,
वक़्त के परतों की धूल बटोरे हुए,
चुपचाप लिए अपना कटोरा,
क्यूंकि मैं असहाय हूँ।
-नीरज

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