शनिवार, 17 नवंबर 2012

ज़र्रे....


कभी कभी लिख लेता हूँ कुछ ज़र्रे ज़िन्दगी के बटोर कर अपने दामन में,
और जब दीवारों के पैबंद चिढाने लगते हैं,
तो इन्ही ज़र्रों को टांक के अपने दीवारों के पैबंद को सिलने बैठ जाता हूँ।
जलता तो रहता हूँ मैं इन सबके बीच, दिवाली के दिए की तरह,
जो अपनी तपन भूल के लक्ष्मी के स्वागत में जलता रहता है खामोश सा बिना कुछ कहे,
और रौशनी में रोशन हो जाते हैं वो कोने, जिन्हें रौशनी कभी नसीब ही नहीं थी,
और फिर इंतज़ार रहता है दिवाली का इन कोनों को, 
जिसमे फिर कोई जलता हुआ दिया अपना दर्द परे रख फिर रोशन कर देगा इन्हें,
और छोड़ जायेगा अपने यादों के निशान, ओश में डूबी हुई रात की खामोश आवाज़ में।
ऐसे ही जब तुम्हारी याद दिल के सर्द कोनों में चुपके से घुस आती है,
तो बिना वक़्त गवाएं मैं सेंक  लेता हूँ तुम्हारी गैर मौजूदगी में पनपी तुम्हारी यादों की चाय के पतीले,
फिर पीता रहता हूँ इस चाय को अपनी नज़रों को तुम्हारी राहों पर रख कर,
और हर आहट पे पलकों को झपका कर यह मुआईना करता रहता हूँ कि कहीं तुम तो नहीं?
सच कहता हूँ इन ज़र्रों से ज़िन्दगी तो नहीं कटती, पर इनके चीथड़े ज़रूर ढँक जाते हैं,
और अपनी मौजूदगी का एहसास पैबंद बनकर हर समय कराते रहते हैं,
और जब हद हो जाती है तो इन पैबंदों  के क्षितिज खंगाल आता हूँ,
तुम्हारी यादों की चाय अपने सिरहाने रख कर।
और फिर कभी कभी लिख लेता हूँ कुछ ज़र्रे ज़िन्दगी के बटोर कर अपने दामन में,
और जब दीवारों के पैबंद चिढाने लगते हैं,
तो इन्ही ज़र्रों को टांक के अपने दीवारों के पैबंद को सिलने बैठ जाता हूँ।

-नीरज 

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