कितने ख़्वाब जी आया
क्षण भर की
उकताई नींद में,
पहाड़ों से गिरते झरनें,
और रात
वादियों से गुजरती
साथ बहती
कलकल करती नदी,
चरमराते बांस में
अंगडाईयां लेती सुबह,
सीखचों से झांकता
कोई धूप का टुकड़ा,
शबनमी रातों का सावन
और सूरज की गर्मी से
टपटपाता कम्बल
मेरी नींद पर आ बैठा,
उठ खड़ा हुआ मैं,
अपने को झाड़ता
लड़ने को नयी जंग !
क्षण भर की
उकताई नींद में,
पहाड़ों से गिरते झरनें,
और रात
वादियों से गुजरती
साथ बहती
कलकल करती नदी,
चरमराते बांस में
अंगडाईयां लेती सुबह,
सीखचों से झांकता
कोई धूप का टुकड़ा,
शबनमी रातों का सावन
और सूरज की गर्मी से
टपटपाता कम्बल
मेरी नींद पर आ बैठा,
उठ खड़ा हुआ मैं,
अपने को झाड़ता
लड़ने को नयी जंग !
-नीरज

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