न जाने क्यूँ मैं बार बार गुलमोहर पर ही लिखता हूँ,
मेरे सपनों के क्षितज में गुलमोहर बार बार आकर लाल हो जाता है,
और जगाने लगता है प्रेम के नए नए भाव,
सच कहूँ अगर बचना भी चाहूँ तो नहीं बच पता,
गुलमोहर यूँ लाल कर जाता है मेरा मानस अपने इन्द्रधनुषी स्वाभाव में,
मेरे पास कुछ भी शेष नहीं रह जाता सिवाय ,
मूक दर्शक बनकर गुलमोहर में घुल जाने के अलावा।
बचपन में दालान में लगे गुलमोहर के नीचे बैठ कर खूब खेला था,
और बार बार यही सोचता था कि ये यूँ लाल होकर सब कुछ लाल क्यूँ कर देता है,
इतना बेशर्म क्यूँकर है, क्या इसे लज्जा नहीं आती,
और खिलने के बाद ये फिर ठूँठ क्यूँ हो जाता है?
अनेकानेक सवाल मन मस्तिष्क में चलते रहते थे,
और गुलमोहर कब मेरे भावों में सम्मिलित हो गया इसका आभाष ही नहीं रहा,
आज भी दालान का वो गुलमोहर जब तब आकर मुझे झिझोर जाता है,
मैं उठकर बेतहाशा भागता हूँ वहां,
पर अब वहां गुलमोहर नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे बचपन।
गुलमोहर से सटा हुआ एक तालाब भी था,
जिसमे पतझड़ में गुलमोहर अपने सारे पत्तों को विसर्जित कर देता था,
और तालाब उन सारे पत्तों को अपनी प्रेमिका की भेंट समझकर बटोर लेता था,
कोयल, मैना , गौरैया, कौवे और न जाने कितने पछी, तालाब के शीतल जल में जल क्रीड़ायें करते थे,
मैं तो बस देखता ही रहता था, अपलक और खुश हुआ करता,
लेकिन समय फुर्र होते हुए कहाँ पता चलता है,
बचपन कब बीता इसका आभाष भी न हुआ,
लेकिन अब गाँव जाने पर दालान में वो ख़ुशी नहीं मिलती,
न ही गौरैया है, और न ही सारे पछियों की जल क्रीड़ायें,
और न ही क्षितिज को लाल करता मेरे मन मानस में बसा मेरा गुलमोहर,
और उसका प्रेमी शीतल तालाब,
अब जल नहीं बहता वहां, बहता है पेट्रोल और डीज़ल,
और दूर तक फैले नागफनी और कैक्टस की बगिया,
और उनके बीचो बीच बिना किसी आधार के एक रस्सी की फाँसी पर,
मुझे हमेशा मानव लटका हुआ दिखता है,
उसकी लाश में, हाँ लाश में लेशमात्र भी कोई हलचल नहीं है,
लेकिन उसकी आँखें गोल गोल घूमती हैं,
और ऐसा लगता है जैसे आँखों में लाल लावा बह रहा हो ...
लाल लावा ......और लाल होता क्षितिज ......गायब होता गुलमोहर।
-नीरज

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