शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

कल की एक बातचीत .........।

कल की एक बातचीत .........

घर बन गया है,
बदल दिया है हमने उसे पूरा,
अबकी बारी आना,

रंग रोगन से लिपा पुता है रूप,
बाहर की तरफ निकलें हैं कुछ पाए,
जिनके नीचे खड़ी कर सकते हो तुम अपनी कार,
रात की शीत से बच जाएगी।

अच्छा तब तो घर पहले से हो गया होगा बड़ा,
फिर शंकर भगवान के स्थान का क्या होगा?
क्या उनके लिए भी घर बना है,
एक मंदिर, कंडैल की शाखाओं के नीचे,
छोटा ही सही?

अरे! तुम भी! शंकर कभी घर में नहीं रहते,
वो तो रहते हैं खुले आसमान के नीचे,
दिशाओं का अम्बर ओढ़े,
दिगम्बर।

फिर भला उनके लिए घर की क्या जरुरत,
अभी वहीँ हैं जहाँ पहले थे,
बगल के कुएँ को भर दिया है,
उसी के ऊपर एक दिन स्वच्छ हाथों से,
प्रणाम कर के स्थानांतरित कर दिए जायेंगे दिगम्बर।

बगल का कुआँ, वह भी?
और स्थानांतरित होते दिगंबर .....?
कंडैल के पीले फूलों वाला बचपन,
और कुएं की जगत से झांक कर,
गहराई मापता मानस।

कल की बातचीत में सब कुछ बदल गया,
नया घर, नयी कार, टूटती बैलगाड़ी,
दालान के पास बने हुए मिट्टी के घर के पास,
धूल फांकता हल क्या आज भी खड़ा होगा?

प्रश्नों से निकलते नए प्रश्न,
सुबह पूर्व के आसमान में डूबता सूर्य,
और जरूरतों के मद्देनज़र बदलते दिगम्बर,
गायब होता हुआ कुआँ,
और टप से बुदबुदाते आमों वाली बगिया?
कल की एक बातचीत में अभी भी खड़े है,
गवाही देते हुए अपने होने की।

-नीरज

0 टिप्पणी:

एक टिप्पणी भेजें

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
 

Me and my thoughts © 2013