मंगलवार, 20 नवंबर 2012

दोगलापन......

स्त्रीमुक्ति, स्त्रियों के प्रति बढती हिंसा,
रोज़ सुबह का अख़बार ऐसी ख़बरों से भरा होता है ,
कहीं बलात्कार, तो कहीं दहेज़ के लिए जला दी गयी बहु,
अनेकानेक खबरें और उसके अनेकानेक तर्क वितर्क के बीच नारी।
अदालतों में धूल की खाक छानती अनेकों ऐसी फ़ाइलें चूहों ने कुतर डाली,
न्यूज़ चैनलों पर घंटो परिचर्चाएं चलती रहती हैं,
संवेदनाओं का सागर उफानें ले लेकर दहाड़ता है,
लेकिन बस उसी वक़्त, बंद ए सी कमरों में,
जिनसे आवाज़ें बाहर नहीं निकलती और सुन रहा सारा देश होता है,
ऐसा मैं नहीं वही कहते हैं, लेकिन फिर भी महिलाएं जस की तस हैं,
जैसी थी पहले वैसी ही आज भी, कल भी दिल धड़कता था,
जब बहन, बीवी, मां या कोई और महिला सदस्य घर से बहार निकलती थी,
और आज भी लगता है, ऐसा लगता है जैसे सब कुछ स्थिर सा हो गया है,स्थिर।
सच तो यह है कि हम सिर्फ कहते हैं करते नहीं, नहीं तो यह स्थिरता नहीं होती,
नहीं होती भ्रूण हत्या, न ही जलती कोई बहु और न ही होते इनसे दुराचार,
सच तो यह है कि हम सत्य कहते हैं देखते नहीं, और सिर्फ कहने भर से सत्य, सत्य नहीं हो जाता,
उसे करना भी पड़ता है, देखना भी पड़ता है, और जरुरत पड़ती है उसे खुद में तलाशने की भी,
बंद कमरों में बातें करते हुए आवेशित होना समझ में आता है,
लेकिन घर आकर अपनी ही बहु का कन्या भ्रूण गिरवाना, समझ से परे है,
बेटी के प्रेम पर भवें तनती हैं, लेकिन खुद के किये कृत्य बलपूर्वक दबवा दिए जाते हैं,
वेश्याएं बहन सामान हैं कहते हुए गदगद होना अच्छी बात है,
लेकिन उन्ही वेश्यायों का बदन नोचते समय?
नहीं समझ में आता मुझे ये दोगलापन, हाँ दोगलापन।
और सबसे बड़ी बात जो नहीं समझ आती वो यह की स्त्री अब भी अबला क्यूँ हैं,
सत्य तो यह है कि स्त्री स्वयं स्त्री की नहीं है, जब घर में बहु जलती है,
तो क्या सास कहीं और होती है, या बेटी के प्रेम पर उसे मारते समय,
उसकी बहन, भाभी या माँ हाथ जलाये बैठे रहते हैं,
क्षमा चाहूँगा अपनी उग्रता पर लेकिन इस उग्रता की जरुरत मुझे नहीं,
नारी तुम्हे स्वयं है, बंद करो सहना, यह हिंसा, यह अत्याचार, हे जननी।

-नीरज 

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