शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

तुम्हारी पुर्जियां याद़ों की।

बस कुछ ख़्वाब हैं सोये से,
और कुछ पुर्जियां याद़ों की,
तुम्हारी,
जेहन में मेरे,
प्यार के गीले बक्से में मुड़ी तुड़ी रखी हुई।

कुछ शरमाई है गुलाबी गालों की,
और गुलमोहर सी शामें,
ट्रेन के गुजरने के बाद का सन्नाटा भी,
और पटरियों पर बेतरतीब फैला तुम्हारा बदन,
दिल के किसी कोने में बंद है आज भी तुम्हारी सांसें,
और सहमती हुई आँखों की गीली पलकें।

उस आखरी लिफाफे में बंद है वो राज़,
जिन्हें खोलने की सच कहूँ तो,
हिम्मत नहीं होती,
नीम सी ज़िन्दगी है, 
और बंद कमरे की सीलन में सालती हवा,
ज़िक्र है समय के चक्रों में,
तुम्हारे बाद माँ  की सर्द आँखों में छिपे पानी का,
और भीड़ से दूर खुश होती मुछों पे ताव देती उन उँगलियों का भी,
जिन्होंने गला घोंट दिया था मेरे तुम्हारे अंकुरित हुए संवादों का।

-नीरज 

0 टिप्पणी:

एक टिप्पणी भेजें

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
 

Me and my thoughts © 2013