सोमवार, 19 नवंबर 2012

प्रेमलता..............।

याद है मुझे,  जब मुझसे वो पहली बार मिली थी,
आँखों  में तैर रहा था अथाह महासागर,
और जीवन में सिर्फ नदी ही नदी बह रही थी,
निर्मल, निर्झर, लगातार, कलकल।
सपनों के पर विशाल होते हैं, उसके भी थे,
तितलियों की तरह झिलमिलाती हुई झट से उड़ जाती थी,
हाथ बढ़ाने पर फिसल जाती थी तेल की तरह,
और नदी बनकर बह आती थी सपनों के हजारों मील,
सच कहूँ तो उस दुबली पतली काया में कुछ भी नहीं था,
सिवाय सपनों के अथाह महासागर के,
वह तो बस प्रेम की लता थी, प्रेमलता..............।
वह लता जिसे दुनिया नहीं, भावों से प्रेम था,
और इसी भाव में बहकर जब वह मेरे पास एक दिन पहुंची,
आँखों में सुरंगें बनी हुई थी, और सुर्ख गलों पर नीले नीले निशान,
नदी का बहाव अचानक ही थम गया था, रह गया था,
तो बस दूर तक फैले डेल्टा की अथाह जलराशि और भयावह निर्जनता,
और कहीं से नदी को खा लेने पर आतुर धीमी सी प्रस्फुटित होती,
समुद्र की दहाड़............।
मैंने क्षण भर उसे देखा, लेकिन कुछ बोल न पाया,
बोलता भी क्या, यह स्वयं ही जाहिर हो चुका था,
कि हिरणी बिध गयी थी, शेर के पंजों से,
स्वप्नों के विशाल डैने उतने ताकतवर न थे, जितना उसने सोचा था,
और आ गिरी थी सत्य के कठोर धरातल पर जहाँ सिर्फ देह ही प्रेम था,
लता नहीं, प्रेमलता नहीं........................।
बस वह सिर्फ बैठी रही मौन सी, मेरी तरफ देखा भी नहीं,
कुछ कहना था शायद उसे, कह भी न पाई,
पलकें उठीं, फिर ढल गयीं,
और फिर न जाने कहाँ से हिम्मत जुटा के उसने मेरी आँखों में एक बार झाँका,
उठी और चली गयी, मैं देखता ही रहा उसे, समझने के भरसक प्रयास में,
लेकिन वह जा चुकी थी,
और मेरी खिड़की में सूरज डूब रहा था, चुपचाप, बिना कुछ कहे।
-नीरज 

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