| गूगल से साभार |
गंगा के हिलकोरों की थपथप में न जाने कहाँ विचर आया करते थे...
एक शाम वो भी थी एक शाम ये भी है,
दूर तक फैला सन्नाटा और रह रह कर आती कीट पतंगों की आवाजें,
अजीब सा लग रहा है कुछ यहाँ आज,
दुनिया जैसे ठहर सी गयी हैं अपने मध्य कहीं,
बदल गया है सब कुछ,
बदल गए हैं हम,
अब तो चाय के अड्डे भी कहीं नहीं दिखते,
आस पास के दरख़्त ऐसे खड़े है जैसे उन्होंने इंतज़ार करना भी अब छोड़ दिया है,
बस गिरा देते हैं अपनी पत्तियां हवा के बहने पर,
तुम्हारी और हमारी यादों में,
घाट पर ठहरे पानी में बहती गन्दगी की बू,
और सूअरों का समूह,
एक शाम वो भी थी एक शाम ये भी है,
जैसे सचमुच बदल गयी है दूनिया,
और ठहर गयी है जाकर मल्टीप्लेक्सेस में, मॉल्स में,
और बंद कमरे की चुनी हुई दीवारों में,
सचमुच आघात कहूँ या कुछ और, लेकिन बदल गए हैं हम
और साथ साथ हमारी दूनिया और जीने के ढंग.........
-नीरज
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