बड़े दिनों से इस सोच में पड़ा रहा कि क्या करूँ इस कविता का, शब्दों के साथ
न्याय हो पाया है या नहीं, इसके अलावा भी अन्य कई खयाल, लेकिन इन सबको
झटककर आज आपसे पूछने आ ही गया हूँ, कि क्या यह गलत है या सही? जो भी है अब आपके हाथों में।
मैं बस सोचता रहता हूँ,
करता कुछ नहीं, वैसे भी करने से क्या उखड़ने वाला है,
अगर उखड़ना या उखाड़ना होता तो यहाँ बैठा कविता थोड़े ही लिख रहा होता,
सच कहता हूँ, यह तो होना ही था एक दिन, इसे आप आज की उपज न समझें,
बरसों से पाल-पोस कर इतना बड़ा किया है,
तब कहीं जाके आज फूटी है इसमें बालियाँ,
पहले खेतों में जार जार किया,
फिर प्रेमिका बनाकर बांटा,
दलित के नाम पर लूटा खसोटा,
आदिवासी बताकर महीनो लूटा,
लूटता ही रहा, हर रूप में, रंग में, जहाँ मिली जैसी मिली, मार कर पीट कर,
अब यह तो अधिकार था पुरुष होने का,
पुरुष होने की दबंगई यूँ ही थोड़े न आ जाती है,
खैर, छोडिये आप को इन सबसे क्या लेना देना,
आप तो मज़े लीजिये,
टी आर पी बढाइये,
और चटखारे ले लेकर नमक मिर्च लगाकर देखिये न्यूज़ चैनल्स,
और आँखें घुमा घुमा कर पढ़िए खबर,
अमा मियां आप भी नाहक ही परेशान होते हैं, यह तो बस एक दौर है,
जो गुजर जायेगा, और रह जाएगी वो लड़की,
जिसके साथ वह सब कुछ हुआ जो आपकी आँखें चलचित्र पर देखना चाहती थी,
देखा सुनते ही आँखें फ़ैल गयी न, चमक तो देखिये मियां,
अन्दर का भेड़िया गुर्राने लगा है,
जीभ से टपकने लगी है लार,
कि काश!! उनकी जगह हम होते,
या फिर हो रहा होता यह सब हमारे सम्मुख,
मियां राम सिंह, तुम तो बेकार निकले,
हमें बुला लिया होता तो आज यहाँ बाहर कोई और ताज़ा गोश्त काट रहे होते,
अरे आप तो यूँ ही नज़रें छुपा रहे हैं,
मैंने आपकी एक ही गांठ तो पकड़ी है अभी,
आप के दिल में तो कुछ और भी चल रहा होगा, है न,
बिलकुल सही,
कवि हूँ न, अन्दर तक पैठ नहीं पाता,
बस ऊपर ऊपर ही नज़रें घुमाकर अंदाज़े पर लिखने बैठ जाता हूँ,
लेकिन आज क्या सही पकड़ी है मैंने, है न?
चलिए कोई नहीं,
लेकिन यह क्या पब्लिक भड़क गयी है,
अब कहाँ भागेंगे आप और कहाँ जाकर मरेगा आपके अन्दर का यह भेड़िया,
फिर भी चिंता न कीजिये आप,
यह तो बस कुछ समय की बात है,
आयं क्या कहा,
हाँ वह तो है,
आज तो मनचले भी बदल गए हैं,
हाथों में मशाल लेकर दिलाने चले हैं न्याय,
लेकिन आप फिक्र न कीजिये बस कुछ दिनों की ही बात है,
फिर दिख जायेंगे आप को यह उसी बस अड्डे पर,
लड़कियों को छेड़ते,
शिकार तलाशने गए होंगे वहां,
या फिर थोडा बहुत दिल तो सबके अन्दर होता है,
पिघल गया होगा,
अब आपकी तरह इतना कटु थोड़े न है सबका,
अच्छा एक बात बताइए,
आपके घर में भी बहन, माँ, बेटी या बहु है?
अरे बुरा न मानिये, सुनिए तो,
है या नहीं,
ओ हो .................
कल आप ही तरह कोई उन्हें लूटेगा तब तो आप तालियाँ बजायेंगे,
क्यूँ है न,
अरे मैंने तो पहले ही कहा था आपको,
बरसों पालने पोसने पर जाके कहीं पैदा होते हैं राम सिंह जैसे जानवर,
और आप तो राम सिंह के भी बाप है,
तो भला यह नागवार क्यूँ गुजर रहा है मियां?
-नीरज
मैं बस सोचता रहता हूँ,
करता कुछ नहीं, वैसे भी करने से क्या उखड़ने वाला है,
अगर उखड़ना या उखाड़ना होता तो यहाँ बैठा कविता थोड़े ही लिख रहा होता,
सच कहता हूँ, यह तो होना ही था एक दिन, इसे आप आज की उपज न समझें,
बरसों से पाल-पोस कर इतना बड़ा किया है,
तब कहीं जाके आज फूटी है इसमें बालियाँ,
पहले खेतों में जार जार किया,
फिर प्रेमिका बनाकर बांटा,
दलित के नाम पर लूटा खसोटा,
आदिवासी बताकर महीनो लूटा,
लूटता ही रहा, हर रूप में, रंग में, जहाँ मिली जैसी मिली, मार कर पीट कर,
अब यह तो अधिकार था पुरुष होने का,
पुरुष होने की दबंगई यूँ ही थोड़े न आ जाती है,
खैर, छोडिये आप को इन सबसे क्या लेना देना,
आप तो मज़े लीजिये,
टी आर पी बढाइये,
और चटखारे ले लेकर नमक मिर्च लगाकर देखिये न्यूज़ चैनल्स,
और आँखें घुमा घुमा कर पढ़िए खबर,
अमा मियां आप भी नाहक ही परेशान होते हैं, यह तो बस एक दौर है,
जो गुजर जायेगा, और रह जाएगी वो लड़की,
जिसके साथ वह सब कुछ हुआ जो आपकी आँखें चलचित्र पर देखना चाहती थी,
देखा सुनते ही आँखें फ़ैल गयी न, चमक तो देखिये मियां,
अन्दर का भेड़िया गुर्राने लगा है,
जीभ से टपकने लगी है लार,
कि काश!! उनकी जगह हम होते,
मियां राम सिंह, तुम तो बेकार निकले,
हमें बुला लिया होता तो आज यहाँ बाहर कोई और ताज़ा गोश्त काट रहे होते,
अरे आप तो यूँ ही नज़रें छुपा रहे हैं,
मैंने आपकी एक ही गांठ तो पकड़ी है अभी,
आप के दिल में तो कुछ और भी चल रहा होगा, है न,
बिलकुल सही,
कवि हूँ न, अन्दर तक पैठ नहीं पाता,
बस ऊपर ऊपर ही नज़रें घुमाकर अंदाज़े पर लिखने बैठ जाता हूँ,
चलिए कोई नहीं,
लेकिन यह क्या पब्लिक भड़क गयी है,
फिर भी चिंता न कीजिये आप,
यह तो बस कुछ समय की बात है,
आयं क्या कहा,
हाँ वह तो है,
आज तो मनचले भी बदल गए हैं,
हाथों में मशाल लेकर दिलाने चले हैं न्याय,

फिर दिख जायेंगे आप को यह उसी बस अड्डे पर,
लड़कियों को छेड़ते,
शिकार तलाशने गए होंगे वहां,
या फिर थोडा बहुत दिल तो सबके अन्दर होता है,
पिघल गया होगा,
अब आपकी तरह इतना कटु थोड़े न है सबका,
अच्छा एक बात बताइए,
आपके घर में भी बहन, माँ, बेटी या बहु है?
अरे बुरा न मानिये, सुनिए तो,
है या नहीं,
ओ हो .................
कल आप ही तरह कोई उन्हें लूटेगा तब तो आप तालियाँ बजायेंगे,
क्यूँ है न,
अरे मैंने तो पहले ही कहा था आपको,
बरसों पालने पोसने पर जाके कहीं पैदा होते हैं राम सिंह जैसे जानवर,
और आप तो राम सिंह के भी बाप है,
तो भला यह नागवार क्यूँ गुजर रहा है मियां?
-नीरज

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