खाली कैनवास ठीक वैसा ही होता है,
जैसे कोरे कागज़,
जो चाहो लिख डालो,
जैसे गीली मिटटी,
जैसा चाहो रूप दे दो,
एक नयी रचना को निमंत्रण देता हुआ,
और उसके बाद की खुशियों में घुलता हुआ,
पर खाली कैनवास दर्द भी देता है,
सालता रहता है रह रह कर,
अगर कुछ रह जाये अधूरा, छूटा हुआ,
मिट्टी के महीन कणों सा,
किर्र किर्र करकर।
-नीरज

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