मंगलवार, 22 जनवरी 2013

अनजान

उसने मुझसे वह कभी नहीं कहा,
जो वह कहना चाहती थी,
जब भी मिली,
उसने कभी मुझसे बात नहीं की,
बस निहारती रही,
अपनी बड़ी बड़ी आँखों से मुझे,
आज फिर मैं वहीँ खड़ा हूँ,
जहाँ वह मुझसे मिलती थी,
चुपचाप अपनी आँखों से कुछ कहती हुई,
भला क्यूँ नहीं समझ पाया,
मैं नयनों की भाषा,
या समझकर भी बना रहा मैं,
अनजान।

-नीरज

4 टिप्पणी:

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

कभी कभी जिंदगी में अजनान बन कर जीना जरुरी हो जाता है

Niraj Pal ने कहा…

लेकिन इस अनजानेपन में छूट जाते हैं कुछ पल, जिनका होना शायद बहुत जरुरी होता है।

Yashwant R. B. Mathur ने कहा…


दिनांक 17 /02/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
धन्यवाद!

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पत्थर का गुण.....हलचल का रविवारीय विशेषांक.......रचनाकार संगीता स्वरूप जी

Asha Lata Saxena ने कहा…

अनजान बने रह्कर भी बहुत कुछ समझ में आता है |
आशा

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