सोमवार, 14 जनवरी 2013

अनवरत

गूगल से साभार।

क्या मैं वो हो सकता हूँ,
जो मैं नहीं हूँ?
एक विचार , एक सोच, जो मेरी नहीं है,
क्या हो सकती है मेरी?
क्या शामिल हो सकती है मेरी शख्सियत,
अनजान पन्नों की फड़फड़ाहट में?
या फिर गुम्बद के नीचे गूंजती,
अनजान आवाजों में ढूंढता ही रहूँगा,
मैं अपनी आवाज़?
सोचता हूँ, समझता हूँ, परखने की कोशिश भी करता हूँ, लेकिन सब बेकार होकर मिल जाता है रंगहीन पानी में, और जब हकबकाकर देखता हूँ तो वह रंगीन पानी मुझे अपना सा लगता है,
लेकिन यह मृग मरीचिका,
कुछ घंटों में ही यथार्थ पर धराशायी होकर दम तोड़ देती है,
और मैं फिर वही रहता हूँ,
रंगहीन पानी,
और जारी रहती है मेरी खोज,
"खुद की" जो शायद अभी भी रौंदी जा रही है,
अनेकों विचारों और सोचों के पैरों तले।

अगर इतना ही गलत हूँ मैं,
तो भला शांत सरोवर ही क्यूँ नहीं रहने देते मुझे,
पत्थर मारकर विवश क्यूँ करते हो हिलकोरे लेने को,
और क्यूँ मेरी सतह भरते जाते हो अपने गूढ़ विचारों के पत्थर,
विचारों के इन पत्थरों ने भुला ही दिया है मुझे,
मेरी सतह की कोमलता,
सूखता भी तो नहीं मैं,
कहीं न कहीं से कोई पतली धार,
आकर गिरती ही रहती है मुझमे,
कि अनवरत चलती रहे मेरी खोज,
"खुद की" ..............................
..........................................
विचारों के रंगहीन पानी की यात्रा,
अनवरत .....................................अनवरत .................................।
-नीरज

0 टिप्पणी:

एक टिप्पणी भेजें

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
 

Me and my thoughts © 2013