रात हो चुकी थी,
सड़कों पर कहीं अँधेरा तनहा था,
तो कहीं रौशनी चुपचाप सूनसान सी बिखरी हुई थी,
और ऊपर आकाश में चाँद टंगा हुआ,
न जाने क्या देख रहा था/चुपचाप/शांत,
गंगा रह रह कर कभी हिलकोरें ले लेती थी,
और लहरों की आवाज़ दूर तक फ़ैल जाती थी,
खुशबू बनकर,
और शांत निश्चल धारा में,
रेंग रही थी,
एक नाव,
मेरे सपनों की,
जिसमे तुम्हारा हाथ थामे,
बैठा हुआ था मैं,
और चांदनी ठहर ठहर कर,
तुम्हारे चेहरे पर कुछ यूँ गिरती थी,
कि बस तुम्हारी आँखें भर दिखती थी मुझे,
जिनमे बहुत सारा प्यार था,
और तुम्हारे होठ जब लरजते थे,
तो नदी लहराकर नाव पर चढ़ आती थी,
और मैं बिफर कर देखता था उसे,
उसके पलटने से पहले ही चाँद तुम्हे पूरा देख लेता था,
और मेरे लिए छोड़ता था सिर्फ तुम्हारी आँखें,
मैं खुश हो जाता था,
क्यूंकि इन आँखों का प्यार चाँद नहीं देख पाता था,
और इसीलिए सूखकर सफ़ेद पड़ गया था,
मैं खुश था,
बहुत खुश था,
तुम मेरे करीब थी,
कि आँखें खुल गयी,
और दिन के संपूर्ण उजाले में,
तुम मेरे सामने खड़ी थी,
हाथों में चाय का कप लिए हुए,
और तुम्हारी आँखों में अब भी वही प्रेम था,
क्या तुम मेरे सपनों में झांक रही थी,
या फिर यूँ ही रहती हो,
हमेशा प्रेम से सरोबार मेरे लिए।
-नीरज

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