चित्र गूगल से साभार
ट्रेन क उस डिब्बे में,
झिर्रियों से धूप झांक रही थी,
कुछ लोग सोये हुए थे,
तो कुछ बातों में मशगूल,
बातें भी ऐसी कि ,
जो बदल दे पूरी व्यवस्था,
और एक मासूम,
हाथों में झाड़ू लिए,
गलियारे और हर सीट,
के नीचे झुक झुक कर,
निकाल रहा था फैले कचड़े,
और बटोर रहा था
धूल,
मिश्रित मनुष्यता का,
कुछ लोग उसे ऐसे देख रहे थे,
जैसे क्या हो वो,
लेकिन वह मशगूल था,
अपने कार्य में,
इसके उपरांत वह सबकी सीट पर पहुँच कर मांग रहा था,
अपने श्रम के बदले कुछ पैसे,
कुछ ने झिड़का, कुछ ने दिया,
स्टेशन आ गया ,
उसके पास इकठ्ठे थे अब कुछ पैसे,
वह उतरा और जोर से चिल्लाया,
आज भारत है!!!!
आज भारत है!!!!
कहीं दूर से लाउडस्पीकर पर आवाजें आ रही थी,
गणतंत्र दिवस के मजमे की,
लेकिन इस मासूम की आवाज़ में गुम गयी वो आवाज़,
मैंने भी धीरे से कहा,
"आज भारत है"
-नीरज

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