शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

कुछ नहीं गुमा है यहाँ

चित्र गूगल से साभार

कुछ नहीं गुमा है यहाँ,
पगडंडियाँ अभी भी वैसी ही खिंची पड़ी हैं,
तुम्हारे लगाये मील के पत्थरों के सहारे साँस लेती हुईं,
और दुबक जाती हैं तारकोल के अँधेरे में,
जब तुम्हारी याद की ओस गुमने लगती है,
बरसती धूप की गर्मी में।
यूँ ही नहीं बुलाता तुम्हे बेवज़ह,
जब असह्य हो जाती है,
तुम्हारी नामौजूदगी,
और टेशू जलकर लाल हो जाता है,
तो यादों के देवदार इतने लम्बे हो जाते हैं,
कि ज़मीन से उन्हें देखना मुश्किल हो जाता है,
तब यादों के तिमिर से टपकता झीना सा प्रकाश,
खोज ही लाता है तुम्हे बुलाने की वजह।
सच कहता हूँ,
कुछ भी नहीं गुमा है यहाँ,
न ही हवाएं पूछती हैं बंद अँधेरे में सूरज का पता,
न ही बंद किये हैं अपने दरवाज़े अभी भी,
उस गुमशुदा गली ने,
लौट आओ,
कि अब भी साँस लेती हुई बँसवारी,
जब तब पूछ जाती है तुम्हारा पता,
कभी कभी डर जाता हूँ,
कि कहीं महसूस न कर ले वो भी,
गालों के भंवर में सुख चुके तुम्हारी यादों के अश्रु,
लौट आओ,
कि अभी भी कुछ नमी बचा रखी है,
रोज़ की दहाड़ती धूप के कतरों से,
कि कहीं प्रेम सूखकर पत्थर न बन जाये।

-नीरज




2 टिप्पणी:

Rajendra kumar ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना,धन्यबाद ।

Niraj Pal ने कहा…

आभार राजेंद्र जी।

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