शनिवार, 26 जनवरी 2013

नारी

चित्रकृति गूगल से साभार 

है कुछ मेरे भी सपने,
कुछ आकांक्षाएं,
कुछ महत्वाकांक्षाएं,
कुछ भाव,
कुछ संवेदनाएं,
कुछ अव्यक्त सा,
घुटता रहता है,
हर वक़्त, हर क्षण,
लेकिन सबको दबाकर,
सारी आकांक्षाएं/महत्वाकांक्षाएं/संवेदनाएं,
गुम जाती हूँ मैं तुममे,
इस तरह,
कि मेरी पहचान ही शुरू होती है तुमसे,
कभी कभी सोचती हूँ,
अपने नाम के पीछे के शब्द हटा दूँ,
और उड़ जाउं कहीं दूर,
दूर गगन में,
जी आउं अपने हिस्से का,
सारा जीवन,
कर लूँ पूरी,
सारी आकांक्षाएं/महत्वाकांक्षाएं/संवेदनाएं,
कर दूँ व्यक्त,
जो अब भी अव्यक्त सा,
घुमड़ता है मेरे अन्दर,
लेकिन फिर रुक जाती हूँ,
रोक लेती हूँ अपने सारे भाव,
और लौट आती हूँ,
तुम्हारे बनाये,
सोने के पिंजरे में फिर से,
जिसमे तुमने समाज के ताले लगाये हैं,
लेकिन एक बार सिर्फ एक बार,
काश तुम नारी बनकर,
समझ सकते मेरी भावनाएं।

-नीरज

2 टिप्पणी:

Rajendra kumar ने कहा…

सच है नारी की भावनाओं को समझना थोडा कठिन है,बहुत ही सुन्दर।

Rajendra kumar ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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