बुधवार, 21 दिसंबर 2011

तुम


कितनी महीन सी होती है न वक़्त की चादर...
अभी कल की ही तो बात है...
जब तुम्हारे आलिंगन में डूबा हुआ सारा जहाँ घूम कर आ गया था..
पार्क की चारदीवारी से सटे हुए गुलमोहर ने भी,
हमारी उपस्थिति दर्ज कर ली थी...
याद है वो गार्ड जो हमें देखते ही मुह फेर लिया करता था...
अपने कानों और आँखों पे अपने हाथों को ले जाकर न जाने किन आकृतियों को बनाकर,
शून्य में नमस्कार किया करता था...
पर हमें कहाँ खबर होती थी इन बातों की,
हम तो डूब जाते थे अपनी ही बातों में.....
जो न जाने कितनी होती थी...
कि शाम ढलने के बाद भी ख़तम न होकर...
देर रात तक फ़ोन पर भी हुआ करती थी....
फिर वक़्त ने हलकी सी अंगड़ाई क्या ली...
हम कहाँ से कहाँ आ गए....एक छोर से दूसरे छोर तक न जाने कितना लम्बा सफ़र तय कर लिया...
फिर भी ये बातें अभी कल ही की तो लगती हैं...
एक झीनी सी चादर की तरह...
जिनके आर पर सब कुछ साफ साफ दिखता है....

-नीरज

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