अजीब ये कहानी है....कुछ अजीब ही फ़साना है...
ज़िन्दगी की इस दौड़ में क्या कुछ भी नहीं हमारा है?
कुछ पाना है कुछ खोना है.....
तो फिर क्यूँ आँखों का यह कोना यूँ सूना है....
हँसना है कभी रोना है.....
ज़िन्दगी का भी कुछ अजीब ही फ़साना है...
हर लम्हे में बनती लाखों कहानियां हैं...
ज़िन्दगी ने वक़्त से भी कुछ यूँ लगाया अपना रेला है...
एक पल में सब कुछ...अगले पल ही कागज़ कोरा है...
ज़िन्दगी का कुछ और नहीं यह तो बस एक खेला है...
खेलना इसको कुछ ऐसे है....
की मुठ्ठी है राख की....लेकिन लगनी दूसरों को सोना है...
अजीब ये कहानी है....कुछ अजीब ही फ़साना है...
ज़िन्दगी की इस दौड़ में क्या कुछ भी नहीं हमारा है?
-नीरज
ज़िन्दगी की इस दौड़ में क्या कुछ भी नहीं हमारा है?
कुछ पाना है कुछ खोना है.....
तो फिर क्यूँ आँखों का यह कोना यूँ सूना है....
हँसना है कभी रोना है.....
ज़िन्दगी का भी कुछ अजीब ही फ़साना है...
हर लम्हे में बनती लाखों कहानियां हैं...
ज़िन्दगी ने वक़्त से भी कुछ यूँ लगाया अपना रेला है...
एक पल में सब कुछ...अगले पल ही कागज़ कोरा है...
ज़िन्दगी का कुछ और नहीं यह तो बस एक खेला है...
खेलना इसको कुछ ऐसे है....
की मुठ्ठी है राख की....लेकिन लगनी दूसरों को सोना है...
अजीब ये कहानी है....कुछ अजीब ही फ़साना है...
ज़िन्दगी की इस दौड़ में क्या कुछ भी नहीं हमारा है?
-नीरज
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