गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

ज़िन्दगी........कुछ यूँ...


क्या बात है, ज़िन्दगी बड़ी अजीब है, न जाने कितने रंगों में छिपी इसकी
दास्ताँ है,
हर वक़्त कब करवट लेके किस पलटी मार के बैठ जाये , किसने देखा है भला और
कौन बताएगा यहाँ,
यह बस ज़िन्दगी है जो जिए जानी है,......................
कुछ धूप है कुछ छाँव है, ज़िन्दगी बस इसी का तो नाम है........
न जाने कब कहाँ और कैसे किस मोड़ पर लिखी हमारी तुम्हरी मिलन की दास्ताँ है......
ये ज़िन्दगी है....कुछ ऐसी ही, बस ऐसी ही......
न हमें खबर है न तुम्हे बस जिए जानी है यह ज़िन्दगी कुछ यूँ
कि हर पल में शुमार हो तेरी हर याद
और यादों के हर ज़र्रे से जुड़ी हो मेरी ज़िन्दगी की हर दास्ताँ कुछ ऐसे
कि न तुम बिन हम और न हमारे बिन तुम.............
क्या बात है, ज़िन्दगी बड़ी अजीब है, न जाने कितने रंगों में छिपी इसकी दास्ताँ है,
हमने तो सोचा भी न था कुछ यूँ रंग लाएगी ज़िन्दगी
हर लम्हों में एक अलहदा रंग दिखाएगी ज़िन्दगी,
हर पाल के साये से निकल कर एक अलग ही रंग, रूप और आकार लेकर हंसाएगी,
गुदगुदाएगी ज़िन्दगी
पर यही है ज़िन्दगी, एक अनमनी सी अनजान सी....बस एक नए समय के रंगों क़ी
फुहार है ज़िन्दगी,
तेरे मेरे दरमयां पसरे इन फसलों क़ी भी गवाह है ज़िन्दगी.....
सब कुछ होकर भी न होने का एहसास है ज़िन्दगी......
यही है यही है शायद यही है ज़िन्दगी.....
पर इसे कहाँ मेरे शब्दों क़ी डरकर है......यह तो पूर्ण होकर भी .......
अपूर्णता का संताप है ज़िन्दगी....
तुमसे मुझसे और न जाने कितनों से मिलकर बनी एक अबूझ पहेली,
ग़म ख़ुशी और हर पहलु क़ी किताब है ज़िन्दगी.....
क्या तेरा है क्या मेरा है...............कैसे कहें ज़िन्दगी क़ी बातों में भी
न होने का एहसास है ज़िन्दगी...........
"नील" तेरे शब्दों में न उतरे ये न सही पर ..........
तेरी शख्शियत में शुमार है ज़िन्दगी....
क्या बात है, ज़िन्दगी बड़ी अजीब है, न जाने कितने रंगों में छिपी इसकी दास्ताँ है....

-नीरज

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